Re. No. MP-47–0010301

???? खबर का असर: “भुईमाड़ में अब भगवान नहीं, डॉक्टर करेंगे इलाज”

???? खबर का असर: “भुईमाड़ में अब भगवान नहीं, डॉक्टर करेंगे इलाज”

सीधी/कुसमी – आखिरकार मीडिया की आवाज ने असर दिखाया और स्वास्थ्य विभाग की नींद टूटी। भुईमाड़ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में लंबे समय से खाली पड़े डॉक्टर के पद पर अब आखिरकार डॉक्टर की तैनाती कर दी गई है। डॉ. ऋषभ गुप्ता के पीजी में चयन के बाद तीन महीने से यह पीएचसी बिना चिकित्सक के चल रही थी। मरीजों को इलाज के लिए कुसमी जाना पड़ता था, और मृतकों के पोस्टमार्टम के लिए भी 20-20 घंटे इंतजार करना पड़ता था।

स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही उजागर

सीधी 24 न्यूज़ द्वारा 15 मई को इस गंभीर अव्यवस्था को लेकर प्रमुखता से खबर चलाई गई थी। रिपोर्ट में दिखाया गया कि किस प्रकार भुईमाड़ में चिकित्सा सेवाएं ठप थीं और एक शव को पोस्टमार्टम के लिए घंटों तक बिना प्रक्रिया के रखा गया। इसके बाद स्वास्थ्य विभाग हरकत में आया और डॉ. बिकट सिंह को तत्काल प्रभाव से भुईमाड़ पीएचसी का प्रभार सौंपने का आदेश जारी कर दिया गया।

तीन माह की खामोशी, किसकी ज़िम्मेदारी?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि तीन महीने तक इस बदहाल स्थिति की किसी भी जिम्मेदार अधिकारी को भनक क्यों नहीं लगी? खंड चिकित्सा अधिकारी की यह घोर लापरवाही केवल एक ड्यूटी ऑर्डर से नहीं धुल सकती। यह लापरवाही केवल व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि आमजन की जान की कीमत को नजरअंदाज करने जैसा है।

मुर्दों को भी नहीं मिला सम्मान

भुईमाड़ में चिकित्सा सेवाओं के अभाव का सबसे वीभत्स चेहरा उस समय सामने आया जब एक मृतक के शव को 20 घंटे तक पोस्टमार्टम के लिए इंतजार करना पड़ा। क्या यह किसी भी संवेदनशील शासन-प्रशासन की छवि हो सकती है? क्या गरीब और ग्रामीण जनता के जीवन का कोई मूल्य नहीं?

बता दें कि ग्राम पंचायत दुधमनिया के रहने वाले पियारे साकेत (60 वर्ष) की 14 मई को जंगल में पेड़ से पत्ते तोड़ते वक्त गिरने से मौत हो गई। परिजनों ने तत्काल भुइमाड़ पुलिस को सूचना दी। पुलिस ने मौके पर पहुंचकर पंचनामा तैयार कर शव को कठौतिया के शवगृह में रखवा दिया, लेकिन यहीं से शुरू हुआ मानवता को शर्मसार करने वाला इंतजार।14 मई को पूरे दिन डॉक्टर नहीं पहुंचे, जिससे पोस्टमार्टम नहीं हो सका। परिजन भूखे-प्यासे शव के पास रात भर चीरघर में सोते रहे।

सुबह भी जब चिकित्सक नहीं मिले तो अपने स्वयं के व्यय पर शव को 50किलोमीटर दूर कुसमी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया ।

अब उम्मीद की किरण?

डॉ. बिकट सिंह की नियुक्ति से अब लोगों को कुछ राहत मिलने की उम्मीद है। लेकिन सवाल यह है कि क्या अब जिंदा और मुर्दा – दोनों को इलाज और अंतिम सम्मान के लिए कुसमी नहीं जाना पड़ेगा? या फिर यह आदेश भी कागजों तक ही सीमित रह जाएगा?

मीडिया की सक्रियता और जनआवाज ने एक बार फिर साबित किया कि जब जनता की आवाज बुलंद होती है, तो व्यवस्था झुकती है। लेकिन ज़रूरत है ऐसे मामलों में स्थायी समाधान की, ताकि भविष्य में किसी गांव को अपने स्वास्थ्य केंद्र में भगवान भरोसे न रहना पड़े।

यह भी पढ़ें –

सीधी:सिस्टम की बेरुख़ी या बदइंतजामी मौत के बाद  लाश को करना पड़ता है 50 किलोमीटर का सफर?

Leave a Comment

Recent Post

Live Cricket Update

You May Like This

error: Content is protected !!