नई दिल्ली: मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) विजयन आनंद नागेश्वरन ने हाल ही में एक अहम चेतावनी दी है, जिसमें उन्होंने मुक्त व्यापार समझौतों (FTAs) की घोषणाओं और वर्तमान नियमों के बीच एक “महत्वपूर्ण” अंतर के बारे में बताया। यह चेतावनी ऐसे समय पर आई है जब यूरोपीय संघ के भारत में राजदूत ने भी इसी प्रकार की बातें कही थीं कि अनुपालन नियमों का प्रयोग व्यापार बाधाओं के रूप में नहीं किया जाना चाहिए।
CEA नागेश्वरन ने कहा कि जबकि FTAs का उद्देश्य व्यापार को सुविधाजनक बनाना और दोनों पक्षों के लिए लाभ सुनिश्चित करना है, मौजूदा नियामक प्रावधान इस उद्देश्य को पूरी तरह पूरा नहीं कर पा रहे हैं। उन्होंने यह भी जोड़ा कि इन नियमों के पीछे की जटिल प्रक्रियाएं और कठोर कारगर नीति बाधाएँ व्यापार गतिविधियों को प्रभावित कर सकती हैं।
यूरोपीय संघ के राजदूत की टिप्पणी और CEA के विचारों में साम्य इस बात की पुष्टि करता है कि भारत को न केवल अपने अंदरूनी नियमों को बल्कि द्विपक्षीय और बहुपक्षीय व्यापार समझौतों के अनुपालन को भी बेहतर संतुलित करना होगा। दोनों अधिकारी इस बात पर जोर देते हैं कि अनुपालन प्रक्रिया को सरल, पारदर्शी और व्यापार-मित्रवत बनाया जाना चाहिए ताकि वह व्यापार विस्तार में बाधा न बने।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस चेतावनी से यह स्पष्ट होता है कि भारत को आर्थिक सुधारों को तेज करते हुए इस संतुलन को स्थापित करना होगा। इससे न केवल विदेशी निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा बल्कि घरेलू उद्योगों को भी वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धात्मक बनने का अवसर मिलेगा।
CEA के अनुसार, वर्तमान समय में आवश्यक है कि भारत का व्यापार नीति और नियामक ढांचा अधिक अनुकूल हो, जिससे वह अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप हो सके और व्यापार में किसी भी प्रकार के छुपे हुए प्रभावों से बचा जा सके। उन्होंने सुझाव दिया कि यह कार्य सरकार, उद्योग और संबंधित संस्थाओं के बीच सहयोग से संभव है।
इस चेतावनी का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि वैश्विक आर्थिक माहौल तेजी से बदल रहा है और देशों के बीच प्रतिस्पर्धा भी बढ़ती जा रही है। भारत की अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करने के लिए आवश्यक है कि वह अपने FTAs के दायरे में आने वाली बाधाओं को कम करे और नियमों का ऐसा ढांचा तैयार करे जिससे सभी प्रतिभागी पक्षों को पारस्परिक लाभ प्राप्त हो सके।
अंततः, CEA नागेश्वरन की यह चेतावनी और यूरोपीय संघ के राजदूत की टिप्पणियाँ संकेत देती हैं कि भारत को अपने व्यापार नीतियों और अनुपालन मॉडलों की समग्र समीक्षा करनी होगी ताकि वह वैश्विक व्यापार में अपनी स्थिति मजबूत कर सके।








