बंगलुरु। भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) द्वारा दशकों तक किए गए एक व्यापक अध्ययन में यह खुलासा हुआ है कि मानवजनित गतिविधियों के कारण पूर्वी हिमालयी क्षेत्र के पक्षियों की संख्या और उनकी विविधता गंभीर खतरे में है। यह अध्ययन न केवल पर्यावरणीय बदलावों की गहराई को दर्शाता है, बल्कि उन प्रभावों को भी उजागर करता है जो पक्षियों के पारिस्थितिक तंत्र पर पड़े हैं।
पूर्वी हिमालयी क्षेत्र अपनी जैव विविधता के लिए विश्व विख्यात है, जहाँ कई दुर्लभ और संकटग्रस्त पक्षी प्रजातियाँ पाई जाती हैं। इस क्षेत्र में मानवीय हस्तक्षेप जैसे वनों की कटाई, कृषि विस्तार, शहरीकरण और प्रदूषण ने पक्षियों के प्राकृतिक आवासों को प्रभावित किया है। IISc के शोधकर्ताओं ने करीब दस वर्षों तक इस क्षेत्र में पक्षी आवासों की निगरानी की और डेटा संग्रहित किया।
अध्ययन के अनुसार, पिछले दस वर्षों में परिदृश्य में हुए बदलाव जैसे वनों की कमी, जल स्रोतों का सूखना एवं मानव गतिविधियों का बढ़ना पक्षी प्रजातियों की संख्या में उल्लेखनीय गिरावट के प्रमुख कारण हैं। शोध टीम ने यह भी संकेत दिया कि पर्यावरणीय असंतुलन न केवल पक्षियों पर असर डाल रहा है, बल्कि इससे पूरे इकोसिस्टम की स्थिरता को खतरा उत्पन्न हो रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पूर्वी हिमालय के पक्षी पारिस्थितिकी तंत्र के सूचक हैं, और उनके संकट में आना व्यापक पर्यावरणीय परिवर्तनों की अनदेखी नहीं की जा सकती। इसलिए तत्काल प्रभावी नीतियाँ और संरक्षणात्मक उपाय अपनाना आवश्यक है ताकि आगामी पीढ़ियाँ इस जैव विविधता का आनन्द ले सकें।
सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों को मिलकर काम करने की भी आवश्यकता है ताकि वनों की कटाई को रोका जा सके, प्रदूषण नियंत्रित किया जा सके और पक्षियों के प्राकृतिक आवासों को पुनःस्थापित किया जा सके। इस अध्ययन के परिणामों को ध्यान में रखते हुए, पर्यावरणीय जागरूकता बढ़ाना और स्थानीय समुदायों को संरक्षण अभियानों में शामिल करना भी जरूरी है।
पूर्वी हिमालयी पक्षियों की सुरक्षा केवल प्राकृतिक विरासत की रक्षा ही नहीं, बल्कि वहां रहने वाले लोगों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का भी समर्थन करती है। आईआईएससी का यह अध्ययन हमें याद दिलाता है कि पर्यावरण के साथ संतुलन बनाए रखना मानवता की सामूहिक जिम्मेदारी है।








