नई दिल्ली। भारत की एलपीजी (तरल पेट्रोलियम गैस) खपत अप्रैल 2024 में पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 16 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। यह गिरावट पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में अस्थिरता के कारण आंशिक रूप से प्रभावित मानी जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस वैश्विक संकट ने घरेलू ऊर्जा मांग को भी सीधे तौर पर प्रभावित किया है।
वित्तीय विश्लेषण बताते हैं कि अप्रैल 2024 में भारत के एलपीजी विक्रय 2.05 मिलियन टन रहा, जो 2023 के अप्रैल महीने में 2.45 मिलियन टन की तुलना में 10.5 प्रतिशत कम है। इस आंकड़े से स्पष्ट होता है कि उपभोक्ता और उद्योग दोनों ने ऊर्जा की खपत में कटौती की है।
सरकार और उद्योग जगत के अधिकारियों का मानना है कि पूर्व मध्य क्षेत्र में राजनीतिक तनाव के चलते तेल और गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव भारतीय बाजार के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। इस वजह से उपभोक्ताओं ने बेहतर ऊर्जा विकल्प अपनाने को प्राथमिकता दी है, जिससे एलपीजी की मांग में कमी आई है।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि एलपीजी की खपत में यह कमी अस्थायी हो सकती है, लेकिन इसके लिए विश्वसनीय आपूर्ति श्रृंखला और स्थिर राजनीतिक माहौल की जरूरत होगी। साथ ही, सरकार द्वारा स्वच्छ और सस्ती ऊर्जा प्रदान करने की योजना भी इस सेक्टर की रिकवरी में मदद कर सकती है।
इसके अलावा, घरेलू उपयोगकर्ताओं के बढ़ते विकल्प और ऊर्जा बचत के प्रति जागरूकता भी इस गिरावट के अन्य कारणों में से एक माना जा रहा है। कई घरों में एलपीजी के स्थान पर सौर ऊर्जा और अन्य वैकल्पिक स्रोतों का इस्तेमाल बढ़ रहा है, जो लंबे समय में भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए सकारात्मक संकेत हैं।
कुल मिलाकर, इस गिरावट के बावजूद भारत का एलपीजी बाजार भविष्य में पुनः स्थिर होने की संभावना रखता है, बशर्ते कि वैश्विक और स्थानीय स्तर पर उचित रणनीतियाँ अपनाई जाएं। उपभोक्ताओं और उद्योगों के लिए यह वक्त बदलाव और अनुकूलन का भी है।








