भोपाल_मध्यप्रदेश के नए मुख्यमंत्री के तौर पर मोहन यादव के नाम पर मुहर लग गई है। सोमवार को भाजपा विधायक दल की बैठक में सर्वसम्मति से उन्हें विधायक दल का नेता चुन लिया गया। शिवराज सिंह ने उनके नाम का प्रस्ताव रखा, जिसका सभी विधायकों ने समर्थन किया। मोहन यादव उज्जैन दक्षिण से विधायक हैं। वे ओबीसी वर्ग से आते हैं। संघ के करीबी हैं।
सोमवार को सभी की निगाहें मुख्यमंत्री पद के चयन पर टिकी हुई थी भाजपा कार्यालय के भीतर प्रदेश का नया मुख्यमंत्री चुना जा रहा था तो बाहर समर्थक अपने-अपने नेताओं के नाम की तख्ती लेकर जिंदाबाद के नारे लगा रहे थे। कुछ शिवराज सिंह चौहान के समर्थन में नारे लगा रहे थे तो कुछ प्रहलाद पटेल का प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ फोटो वाला पोस्टर लेकर नारेबाजी करते दिखे।
कई हाथ में ज्योतिरादित्य सिंधिया और कई कैलाश विजयवर्गीय को मुख्यमंत्री बनाए जाने की मांग करते पोस्टर दिखाते रहे। हालांकि सभी के कान उस गेट की ओर लगे थे, जहां से नए मुख्यमंत्री का नाम सुनाई देने वाला था। इसी बीच अचानक से भीतर से मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाए जाने की सूचना प्राप्त हुई सब हतप्रभ थे उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था कुछ देर बाद जब सूचना की पुष्टि हो गई तब जाकर लोगों ने जय महाकाल के नारे लगाने शुरू कर दिए।
कल घोषित मुख्यमंत्री को लेकर राजनीतिक नेता और पार्टी के पदाधिकारी भले ही प्रसन्न हो लेकिन आम जनमानस के मन में मामा और बस मामा ही बसे हुए हैं और हो भी क्यों ना लंबे समय से सीएम मतलब शिवराज और मध्य प्रदेश के लोग ही नहीं मध्य प्रदेश के बाहर के लोग भी एमपी का मुख्यमंत्री मतलब शिवराज मामा यही जानते थे और लोगों को पूरी उम्मीद थी के सीएम शिवराज ही रहेंगे और इसीलिए उन्होंने भाजपा को बढ़-चढ़कर वोट किया लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान ही जब सीएम का फेस निर्धारित नहीं किया गया था तभी से मामा की विदाई के आसार दिख रहे थे।
चंद लोगों को छोड़ दें तो सीएम शिवराज हर दिल अजीज थे बीते 18 साल में उनके द्वारा एक से बढ़कर एक अनोखी योजनाएं लाई गई जिससे आमजन विशेष कर गरीब और ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को खूब लाभ हुआ बेटियों और महिलाओं के लिए न जाने कहां से तरह-तरह की योजनाएं चलाई गई शिक्षा स्वास्थ्य और लोगों के जरूर की तमाम योजनाएं मामा के शासनकाल में लोगों को मिली। लोग सीएम शिवराज से बेहद आत्मीय रूप से घुल मिल गए थे। सीएम शिवराज ने प्रदेश के लोगों से एक रिश्ता कायम किया था शायद किसी प्रदेश का पहला मुख्यमंत्री होगा जो सभी प्रदेशवासी महिलाओं को अपनी बहन मानता था और खुद को उनके भाई कहता था प्रदेश के हर बच्चे को भांजा समझता था और खुद को उनका मामा कहता था और मामा नाम ही प्रदेश की जनता को रट गया था लेकिन अचानक से कल हुए परिवर्तन के बाद लोगों में काफी उहापोह और संशय की स्थिति है आखिर मां की बदली क्यों हुई..? प्रदेश में अब मामा की क्या भूमिका रहेगी..? क्या मामा की योजनाएं अनवरत चलेगी…? ऐसे ही तमाम सवाल अब लोगों के जहां में आ रहे हैं शिवराज सिंह के मुख्यमंत्री रहते बेशक उनका विरोध होता रहा है लेकिन शायद ही उनकी जैसी लोकप्रियता किसी को हासिल हो सके बताओ और मुख्यमंत्री भाजपा के बैनर तले कोई भी आए पावर उतनी ही रहेगी लेकिन व्यक्तिगत छवि और लोकप्रियता जो शिवराज में थी शायद ही किसी में हो क्योंकि जो हर बहन का भाई, और हर बच्चे का मामा कहलाया है वो शिवराज है,जिसके बल पर भाजपा एमपी में सशक्त हुई वह भी शिवराज है जिसकी योजनाओं ने लोगों को आकर्षित किया वह भी शिवराज है कहने को तो भाजपा शीर्ष नेतृत्व का दवा करती है लेकिन एमपी में जीत का विजेता शिवराज ही है और यदि ऐसा नहीं है तो पहले चेहरा बदल देते फिर चुनाव करवाते तो समझ में आ जाता किसके बात से ज्यादा गोल है…? खैर एमपी में एक लंबी पारी खेलने के बाद शिवराज सिंह चौहान रिटायर्ड हो गए हैं और बहनों के भाई की दुकान सीमट सी गई है अब देखना है की मामा की सौगातें मोहन जी बरकरार रखते हैं या फिर नहीं…








