सांसद का लेटर लेकर दर-दर भटक रहा छोटे लाल, अधिकारी नहीं सुन रहे फरियाद
सीधी_ एक ओर जहां सरकार के नए हो चाहे पुराने नेता लंबे चौड़े वादे कर रहे हैं, लोगों को हर तरह की सुविधा देने का दावा कर रहे हैं और हर समस्याओं के त्वरित निराकरण का दम भर रहे हैं। तो वहीं दूसरी ओर मैदानी अमले और नौकरशाहों की बेफरमानी से आमजन आए दिन परेशान होते रहते हैं। कभी वो अपनी फरियाद लेकर नेताओं के पास जाते हैं तो कभी जनसुनवाई का सहारा लेते हैं थक हार कर सीएम हेल्पलाइन में शिकायत भी करते हैं लेकिन नतीजा शून्य रहता है…?ऐसा ही एक मामला में प्रकाश में आया जहां एक वृद्ध व्यक्ति आवेदन लेकर दफ्तरों के चक्कर काट रहा है लेकिन उसकी समस्या का समाधान नहीं हो सका है बावजूद इसके के उसके पास संसद का लेटर भी है।
जी हां एक ओर तो प्रदेश के लोगों की समस्याओं के निदान के लिए कई तरह के इंतजाम किए गए हैं। लोगों को सरलता से सुविधा मिले उनकी समस्याओं का निदान हो इसके लिए कई तरह की योजनाएं चलाई गई हैं। हाल ही में आज से मध्य प्रदेश में विकास भारत संकल्प यात्रा शुरू होने जा रही है जिसमें पंचायत स्तर तक के लोगों के पास पहुंचकर लोगों को योजनाओं का लाभ दिया जाएगा और उनकी समस्याओं को सुना जाएगा लेकिन दूसरी ओर लोग अपनी समस्याओं को लेकर दर-दर भटकने को मजबूर है। कलेक्ट्रेट कार्यालय में हाथ में आवेदन लेकर भटक रहे एक बुजुर्ग ने बताया कि उसका नाम छोटेलाल पटेल पिता गया दिन पटेल निवासी बरिगवां नंबर 2 तहसील चुरहट का है। वह अत्यंत गरीब है और उसके द्वारा कई महीनो पूर्व बीपीएल में नाम जुड़वाने के लिए आवेदन दिया गया था लेकिन तहसील में उसकी सुनवाई नहीं हुई। इसके बाद करीब दो महीने पहले भ्रमण पर आई तात्कालीन सांसद रीति पाठक द्वारा लेटर लिखकर उन्हें कहा गया था कि तहसील में जाकर अपना नाम जुड़वा लीजिए लेकिन मैदानी अमले की मनमानी के आगे वह लेटर भी बेबस रहा। इसके बाद उक्त बुजुर्ग द्वारा कई बार जनसुनवाई में भी आवेदन दिए गए लेकिन उनकी समस्या का समाधान नहीं हुआ।
उन्होंने बताया कि अधिकारी तारीख देते हैं लेकिन काम नहीं होता कई बार वह अन्य नेताओं के यहां चक्कर लगा चुका है और सरकारी अफसर के पास भी अपनी दरखास्त रखी है लेकिन उसकी समस्या का समाधान नहीं हो पाया है।
दरअसल सरकार चाहे जितने नियम बना ले मैदानी अमले की निष्क्रियता उसपर पलीता लगा देती है हर मंगलवार आयोजित होने वाली जनसुनवाई में सैकड़ो लोग आकर अपनी समस्याएं सुनते हैं। लेकिन समस्याओं का समाधान कितने लोगों को मिल पाता है यह तो सर्वविदित है…?न जाने कितने लोग सीएम हेल्पलाइन पर भी शिकायत करते हैं लेकिन वहां महज आवेदनों की संख्या बढ़ती है, निराकरण नहीं होते। दबाव जब अधिक बढ़ता है तो अधिकारियों द्वारा आनन-फानन में समस्याओं के निराकरण के लिए तय किए गए टारगेट को पूरा किया जाता है और कागजों में समस्याओं का समाधान दर्शा दिया जाता है। कई बार तो लोगों को डरा धमका कर भी सीएम हेल्पलाइन में दर्ज शिकायतों को कटवाया जाता है। पर लोगों की समस्याएं जस की तस बनी हुई है।
कई नियम बने, कई योजनाएं आई यहां तक की घर-घर जाकर लोगों को योजनाओं का लाभ देने का ढिंढोरा पीटा गया उनकी समस्याओं के समाधान का दावा किया गया लेकिन दूर-दराज से अधिकारियों के दफ्तरों में पहुंचने वाले लोग सभी दावों और योजनाओं की पोल खोल देते हैं उनका मानना है कि अधिकारी पहले तो मिलते नहीं है और अगर मिले तो सीधे मुंह बात करना तक उचित नहीं समझते राजस्व अमले की बात करें तो उससे कौन अनजान है। यहां पर तैनात अधिकारी कर्मचारी लोगों को केवल एक ही नजर से देखते हैं और वह सभी को पता है। जिसके कारण ज्यादातर राजस्व अमले में शिकायतों का अंबार है कहीं साहब नहीं है तो कहीं सब के अधीनस्थ…?लोग दूर दराज से आकर हाजिरी लगाकर चले जाते हैं आवश्यकता है इस परंपरा में सुधार की ताकि लोगों को समय पर समाधान मिल सके अगर जायज है तो समस्या का समाधान होना चाहिए और नहीं है तो उन्हें उस बात से अवगत कराना चाहिए महज आवागमन तक बात सीमित नहीं रहनी चाहिए।









