शासन प्रशासन के दावों कि पोल खोलती तस्वीर, कचरे के बीच रोटी की जुगाड़ में बचपन…
– जन कल्याणकारी योजनाओं की अनदेखी
एक तरफ जहां शासन-प्रशासन की ओर से जन कल्याणकारी योजनाएं लागू करने बात कही जा रही है वहीं दूसरी ओर जिले का बचपन कचरे में ढेर में भविष्य की तलाश कर रहा है। देखा जाए तो शहर में दर्जनों नाबालिग नन्हें बच्चे दो जून की रोटी का जुगाड़ करने के लिए ठंड में नंगे पैर सुबह से सायं तक सड़कों पर या कचरा डंपिंग स्थान पर कचरे बीनने लगते हैं और देर तक एकत्रित कर उसे कबाड़ी के पास बेचकर दो समय की रोटी का जुगाड़ करते हैं। उनकी प्रतिदिन की यही दिनचर्या होती है। सर्व शिक्षा अभियान के तहत करोड़ों रुपया खर्चा हो रहा है लेकिन इसका सकारात्मक असर नहीं दिख रहा है। जिन बच्चों को पढऩे के समय हाथों में पेन कॉपी कलम स्कूल में होना चाहिए वहां सड़कों से जरूरत का सामान बिनते नजर आते हैं। ऐसे में तमाम कवायद के बावजूद सबको शिक्षा का सपना व्यर्थ नजर आ रहा है। परिवार पोषण के लिए ये कार्य कर रहे हैं। रात को झुग्गी झोपडियों में रहकर गुजारना उसके बाद पूरे दिन भर प्लास्टिक व बोतलें चुनकर एकत्रित करना उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गया है। सरकार की ओर से बच्चों के लिए कोई योजना नहीं बनाए जाने से बच्चे समाज की मुख्यधारा से वंचित हो रहे हैं, जिससे जन कल्याणकारी योजनाओं की अनदेखी हो रही है।
अरमान धराशायी
सर्दी में सामान्यजन जहां बचाव करने के लिए गर्म कपड़े धारण कर अन्य तरीके अपनाता है, वहीं दूसरी ओर बच्चों का बचपन कूड़े के ढेर में भविष्य तलाशता नजर आता है। उनके पास कोई दूसरा साधन भी तो नहीं है कूड़े के बीच से लोहा, सीसा, प्लास्टिक व प्लास्टिक की बोतलें, लकड़ी के सामान कागज आदि चुनने वाले यह बच्चे सामाजिक व प्रशासनिक उपेक्षा के शिकार हैं। ऐसे बच्चे दूसरे लोगों की ओर आशा भरी निगाहों से देखते हैं। शिक्षा से कोसों दूर ऐसे बच्चों के अरमान जहन में ही धराशायी हो रहे हैं।
बीमारियों से खुली चुनौती
सूरज की पहली किरण पड़ते ही पीठ पर प्लास्टिक का थैला या बोरा ढोते इन बच्चों के स्वास्थ्य सुरक्षा की गारंटी कोई लेने को तैयार नहीं है। गरीबों के कल्याण व सहायतार्थ कई योजनाएं चलाई बावजूद क्षेत्र में गरीबों के बच्चे आज कूड़े के ढेर पर अपना भविष्य तलाश रहे हैं। उनकी रोजी-रोटी इसी कचरे के ढेर पर टिकी हुई है। कूड़े के ढेर में कबाड़ चुनने के दौरान बीमारियों की खुली चुनौती कबूलते ये अपने वजूद की लड़ाई लड़ रहे हैं।








