सीधी: फर्जी विकलांग शिक्षकों पर कार्रवाई में ढिलाई, डीईओ पर संरक्षण का आरोप
सीधी।
जिले में फर्जी विकलांगता प्रमाणपत्र के आधार पर नौकरी कर रहे शिक्षकों के खिलाफ कार्रवाई न होने पर सवाल उठ रहे हैं। कलेक्टर स्वरोचिष सोमवंशी और सिविल सर्जन के बार-बार निर्देश के बावजूद जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) इन शिक्षकों को मेडिकल बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत कराने में विफल रहे हैं।
आरोप है कि डीईओ राजनीतिक दबाव में इन फर्जी शिक्षकों को संरक्षण दे रहे हैं, जिससे आयुक्त लोक शिक्षण संचालनालय भोपाल के निर्देशों का पालन नहीं हो पा रहा है।
फर्जी विकलांग शिक्षक और लंबित मेडिकल परीक्षण
- श्रीमती रमा पाण्डेय (माध्यमिक शिक्षक, प्राथमिक शाला खरहना)।
- प्रकाश पाण्डेय (उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, देवदहा)।
- अंकिता पाण्डेय (जन शिक्षक, ग्राम सगौनी)।
इन शिक्षकों को 7 अगस्त 2024 और 2 सितंबर 2024 को सिविल सर्जन द्वारा मेडिकल बोर्ड के समक्ष पेश होने के लिए नोटिस जारी किए गए थे। बावजूद इसके, ये शिक्षक मेडिकल परीक्षण के लिए उपस्थित नहीं हुए।
सिविल सर्जन और कलेक्टर के प्रयास
- सिविल सर्जन ने तीन बार नोटिस जारी किया:
- निर्देश दिया कि मेडिकल बोर्ड में मूल विकलांगता प्रमाणपत्र के साथ हाजिर हों।
- अनुपस्थित रहने की स्थिति में प्रमाणपत्र रद्द कर पुलिस को मामला सौंपने की चेतावनी दी।
- कलेक्टर के आदेश:
- कलेक्टर ने बार-बार डीईओ को सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए।
- इसके बावजूद कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
डीईओ पर संरक्षण का आरोप
जनपद पंचायत रामपुर नैकिन के उपाध्यक्ष ऋषिराज मिश्रा ने आरोप लगाया कि डीईओ राजनीतिक दबाव के कारण फर्जी विकलांग शिक्षकों पर कार्रवाई नहीं कर रहे हैं।
उन्होंने कहा:
“इन शिक्षकों के खिलाफ ठोस सबूत होने के बावजूद, जिला शिक्षा अधिकारी इन्हें मेडिकल बोर्ड में पेश नहीं करवा रहे। यह शासनादेशों की सीधी अवहेलना है।”
प्रमुख सवाल
- मेडिकल बोर्ड से बच रहे शिक्षक:
- फर्जी विकलांगता प्रमाणपत्र के आधार पर शिक्षक बने ये लोग मेडिकल बोर्ड में क्यों नहीं पेश हो रहे?
- डीईओ की निष्क्रियता:
- बार-बार निर्देश और नोटिस के बावजूद, डीईओ इन शिक्षकों पर कार्रवाई क्यों नहीं कर रहे?
- राजनीतिक दबाव का प्रभाव:
- क्या डीईओ राजनीतिक हस्तक्षेप के चलते फर्जी शिक्षकों को संरक्षण दे रहे हैं?
आगे की कार्रवाई
कलेक्टर और सिविल सर्जन ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर शिक्षक मेडिकल बोर्ड में पेश नहीं होते, तो:
- उनके विकलांगता प्रमाणपत्र रद्द किए जाएंगे।
- प्रकरण पुलिस को सौंपा जाएगा।
- डीईओ पर लापरवाही की कार्रवाई की जा सकती है।
निष्कर्ष
यह मामला प्रशासनिक लापरवाही और राजनीतिक दबाव का उदाहरण बन गया है। फर्जी विकलांगता प्रमाणपत्र से नौकरी कर रहे शिक्षकों के खिलाफ कार्रवाई न होने से शासनादेशों की अवहेलना हो रही है। अब देखना यह है कि कलेक्टर और सिविल सर्जन के अगले कदम क्या होंगे।








