सीधी:दो गज ज़मीन भी नसीब नहीं: मर्चुरी में ठिठुरता रहा अज्ञात का शव, नगर पालिका ने नहीं दी जेसीबी
सीधी |
जब ज़िन्दगी में पहचान नहीं मिली, तो मौत के बाद भी सम्मान नहीं मिला। जिला अस्पताल की मर्चुरी में दो दिन से एक अज्ञात प्रौढ़ का शव इस इंतज़ार में रखा रहा कि कोई उसे दो गज ज़मीन देगा, मगर नगर पालिका की मशीनरी और मानवीयता – दोनों ने जवाब दे दिया।
22 अप्रैल को गंभीर घावों से पीड़ित एक अज्ञात वृद्ध को डायल-100 की मदद से अस्पताल लाया गया था। ज़िंदगी की लड़ाई हारने के बाद 28 अप्रैल की शाम उसने अंतिम सांसें लीं। अस्पताल चौकी पुलिस ने शव को मर्चुरी में रखवाया और अगले दिन पोस्टमार्टम कराया। फिर नगर पालिका को पत्र लिखा गया – बस एक जेसीबी और एक सफाईकर्मी चाहिए था, ताकि अंतिम संस्कार हो सके।
लेकिन प्रशासन के पास “मानवता” के लिए कोई इंतज़ाम नहीं था। न मशीन आई, न सफाईकर्मी। जब पुलिस ने फोन पर संपर्क किया, तो जवाब मिला – “जेसीबी खराब है।”
दो दिन गुजर गए। 1 मई आ गया। मजदूर दिवस मनाया गया, भाषण हुए, पर कोई “श्रम” उस अज्ञात की अंतिम यात्रा के लिए नहीं किया गया। मर्चुरी में उसका शव ठंडा होता रहा, पर व्यवस्था की संवेदनाएं और भी ठंडी निकलीं।
नगर पालिका का जवाब और सवाल
नगर पालिका सीएमओ मिनी अग्रवाल का कहना है, “उस वक्त जेसीबी खराब थी। दोबारा मांग नहीं आई, तो लगा दाह संस्कार हो गया होगा।”
सवाल यह है – क्या संवेदनशील मामलों में दोबारा पत्र आने का इंतज़ार किया जाता है? क्या कोई मानवीय पहल नहीं होनी चाहिए थी?
पुलिस ने निभाया फर्ज, पर अकेले
अस्पताल चौकी प्रभारी रज्जू माझी बताते हैं कि पत्राचार और फोन के बाद भी जब नगर पालिका ने कोई कदम नहीं उठाया, तो पुलिस बेबस हो गई। अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी पालिका की है, लेकिन उन्होंने मुँह मोड़ लिया।
कहानी नहीं, आईना है
यह घटना सिर्फ एक लापरवाही नहीं, बल्कि उस सिस्टम का आईना है जहां एक शव के लिए ज़मीन तो दूर, मशीन भी नहीं मिलती। क्या यही सभ्यता है, जहां मौत के बाद भी इंसान पहचान का मोहताज रह जाता है?
यह सिर्फ प्रशासनिक चूक नहीं है, यह उस अमानवीय सोच का नतीजा है जो ‘अज्ञात’ नाम सुनकर जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लेती है। जब तक ‘मशीन’ नहीं, तब तक ‘मृत्यु’ भी अपूर्ण है – शायद यही आज की व्यवस्था का सच है।









