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नियमितिकरण पर हाईकोर्ट का सख्त रुख, लेकिन सरकार के पास नहीं है अस्थायी कर्मचारियों का आंकड़ा!

नियमितिकरण पर हाईकोर्ट का सख्त रुख, लेकिन सरकार के पास नहीं है अस्थायी कर्मचारियों का आंकड़ा!

भोपाल। प्रदेश में वर्षों से काम कर रहे दैनिक वेतनभोगी और अस्थायी कर्मचारियों के नियमितिकरण को लेकर जबलपुर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से स्पष्ट कार्ययोजना मांगी है। परंतु हैरानी की बात यह है कि सरकार को अब तक यह तक पता नहीं है कि किन विभागों में कितने कर्मचारी दैनिक वेतनभोगी और अस्थायी रूप में कार्यरत हैं। सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) की ओर से फरवरी 2025 में सभी विभागों को 15 दिनों में जानकारी देने के निर्देश दिए गए थे, लेकिन दो माह बाद भी जवाब नहीं मिला।

हाईकोर्ट ने जताई नाराजगी, सरकार से फिर मांगी कार्ययोजना

जग्गू वर्सेस भारत सरकार एवं विनोद कुमार वर्सेस भारत सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आधार पर दायर रिट याचिका के बाद हाईकोर्ट ने 2024 में राज्य सरकार से स्पष्ट जानकारी और कार्ययोजना मांगी थी। कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि दैनिक वेतनभोगी एवं अस्थायी कर्मचारियों के नियमितीकरण को लेकर राज्य सरकार विस्तृत योजना प्रस्तुत करे।

2007 से 2025 तक का ब्योरा मांग रही सरकार, पर विभाग नहीं दे रहे डेटा

सामान्य प्रशासन विभाग ने फरवरी में ही सभी विभागों को निर्देश जारी कर 16 मई 2007 से लेकर 1 जनवरी 2025 की स्थिति में कार्यरत दैनिक वेतनभोगी और अस्थायी कर्मचारियों का ब्यौरा मांगा था। इसके बाद कई बार रिमाइंडर भेजे गए, लेकिन अधिकांश विभागों ने जानकारी नहीं भेजी।

अब सामान्य प्रशासन विभाग ने एक बार फिर सभी विभागों को कहा है कि वे तत्काल तीन प्रकार की सूचनाएं भेजें:

  1. वर्तमान में कार्यरत कुल दैनिक वेतनभोगी और अस्थायी कर्मचारियों की संख्या।
  2. पिछले दस वर्षों तक कार्यरत रहे दैनिक वेतनभोगी/अस्थायी कर्मचारियों की जानकारी (1 जनवरी 2025 की स्थिति तक)।
  3. 16 मई 2007 के फैसले के अनुसार नियमितीकरण के पात्र कर्मचारियों की संख्या।

नियुक्ति है ‘अनियमित’ लेकिन अवैध नहीं

GAD ने स्पष्ट किया है कि 16 मई 2007 की स्थिति में कार्यरत ऐसे कर्मचारी जिनकी नियुक्ति विभागीय प्रक्रिया से नहीं हुई है, उनकी नियुक्ति को “अनियमित” माना जाएगा, लेकिन इसे “अवैध” नहीं माना गया है। ऐसे कर्मचारी जो 1 जनवरी 2025 तक कार्य कर चुके हैं या अभी कर रहे हैं, उनकी जानकारी शासन को भेजी जाए।

एक ओर सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट राज्य सरकार से पारदर्शिता और नियोजन की अपेक्षा कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सरकार के पास ही अपने कर्मचारियों का स्पष्ट ब्योरा नहीं है। यह स्थिति न केवल प्रशासनिक लापरवाही को दर्शाती है, बल्कि हजारों अस्थायी कर्मचारियों के भविष्य को भी अनिश्चितता में डालती है।

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