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सीधी: शोपीस बने सकोरे, कलेक्टर के द्वार पर प्यासे परिंदों का मुंह चिढ़ा रहे सूखे कटोरे

सीधी: शोपीस बने सकोरे, कलेक्टर के द्वार पर प्यासे परिंदों का मुंह चिढ़ा रहे सूखे कटोरे

सीधी:जहां एक ओर भीषण गर्मी में आम लोग अपने घरों की छतों, आंगनों और बालकनियों में पक्षियों के लिए दाना-पानी की व्यवस्था कर पुण्य कमा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर जिला मुख्यालय स्थित करुणा भवन—जिसका नाम सुनते ही करुणा उमड़ पड़नी चाहिए—वहां लटकते हैं कुछ सूखे, प्यालेनुमा, मिट्टी के बर्तन जिन्हें देखकर अब परिंदे भी ठिठकते नहीं, मुंह फेर लेते हैं।

जन-अभियान परिषद की “करुणा” बस सिरेमिक स्टाइल में लटकी रह गई है। पानी तो शायद बजट पास होने के बाद ही डाला जाएगा, या तब जब परिंदे ज्ञापन सौंपेंगे। बर्तन ऐसे टंगे हैं जैसे कह रहे हों—”हमें मत देखो, हम सिर्फ शोभा बढ़ाने के लिए हैं।”

आला अधिकारी जिनके कार्यालय इन्हीं दीवारों के पीछे हैं, शायद सोचते होंगे कि परिंदे अब बोतलबंद पानी पीते होंगे या फिर रेन वाटर हार्वेस्टिंग से खुद ही अपना इंतज़ाम कर लेते होंगे!

अब सवाल ये उठता है कि—क्या ये सकोरे प्यासे पक्षियों के लिए लगाए गए थे या फोटो खिंचवाने और सोशल मीडिया पर ‘करुणा की करतूत’ बताने के लिए?

कैमरे की नजर उन सूखे सकोरों पर जाती है, जो सूरज की तपिश में तपकर खुद ही प्यासे दिख रहे हैं

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