रीवा: सत्ता के मद में चूर समर्थकों का थाने में हंगामा — अफसरशाही लाचार, कानून व्यवस्था पर सवाल
रीवा, 26 जुलाई 2025
रीवा जिले के चोरहटा थाना परिसर में शुक्रवार को जो कुछ हुआ, उसने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया। यह सिर्फ एक थाने का दृश्य नहीं था, बल्कि यह घटना मध्यप्रदेश की कानून व्यवस्था, पुलिस की गरिमा और सत्ता के अहंकार की असल तस्वीर बनकर सामने आई।

पूर्व विधायक एवं भाजपा नेता केपी त्रिपाठी अपने समर्थकों के साथ थाने पहुंचे। वह एक युवक को लेकर आए थे, जिसे पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई पर उन्होंने आपत्ति जताई। इसी दौरान थाने में मौजूद सीएसपी रितु उपाध्याय से उनकी तीखी बहस हो गई। पूर्व विधायक ने सीएसपी को “असंवेदनशील औरत” कह डाला। जब सीएसपी ने तमीज में बात करने को कहा, तो भीड़ बेकाबू हो गई और पुलिस अधिकारियों पर हमला करने की स्थिति बन गई।
थाना प्रभारी के हाथ बंधे, अफसरशाही झुकती नजर आई

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे पीड़ादायक दृश्य वह था जब थाना प्रभारी आशीष मिश्रा भाजपा नेताओं और समर्थकों को शांत करने के लिए बार-बार हाथ जोड़ते रहे। वह “दादा-दादा” कहते हुए कानून को अपील की भाषा में समझाते दिखे। वीडियो और तस्वीरों में साफ देखा जा सकता है कि कैसे एक पुलिस अधिकारी अपनी गरिमा ताक पर रखकर स्थिति को संभालने की कोशिश कर रहा था, लेकिन सत्ता के नशे में चूर समर्थकों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा।
थाने में घुसकर अधिकारियों पर दबाव
पूर्व विधायक के समर्थक थाने में घुस आए और सीएसपी की ओर बढ़ने लगे। आनन-फानन में सीएसपी रितु उपाध्याय को मुख्य गेट के भीतर ले जाकर सुरक्षित किया गया। पूरे थाने का माहौल कुछ ऐसा था मानो कोई राजनीतिक सभा चल रही हो — जहां लोकतंत्र घायल, कानून मौन और पुलिस विवश खड़ी थी।
क्या यही है पुलिस की स्थिति?
इन तस्वीरों ने पूरे प्रदेश से यह सवाल खड़ा कर दिया है:
- क्या पुलिस सिर्फ आम जनता के लिए कठोर है?
- क्या नेताओं के लिए कानून में लचीलापन दर्ज है?
- क्या एक महिला अधिकारी को असंवेदनशील कह देना सत्ता का विशेषाधिकार बन गया है?
रीवा की ये तस्वीरें सिर्फ एक घटना नहीं, एक चेतावनी हैं
जहां एक ओर सरकार महिला सुरक्षा, सम्मान और अफसरशाही को मजबूत बनाने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर एक महिला पुलिस अधिकारी को इस तरह से अपमानित किया जाना निंदनीय है। यह घटना सत्ता की निरंकुशता और पुलिस की विवशता का जीवंत उदाहरण है।
अब जनता पूछ रही है:
- डीजीपी कैलाश मकवाना क्या इस पर संज्ञान लेंगे?
- क्या पूर्व विधायक और उनके समर्थकों पर कोई कार्रवाई होगी?
- क्या पुलिस अधिकारियों की गरिमा की रक्षा हो सकेगी?
इस घटना ने यह सिद्ध कर दिया है कि अगर अब भी सत्ता और तंत्र के संतुलन पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया, तो कानून सिर्फ किताबों में सिमट कर रह जाएगा।








