“NH-39: विकास की सड़क या वादों की शवयात्रा?”
कहते हैं, सड़कें विकास की धड़कन होती हैं —
पर NH-39 तो लगता है “राजनीति की नाड़ी” बन चुकी है — जो सिर्फ चुनावों के मौसम में ही चलती है।
पंद्रह साल हो गए, और सीधी-सिंगरौली की सड़क अब तक “निर्माणाधीन” नहीं, बल्कि “निराशाधीन” है।
हर सरकार ने इसे अपनी उपलब्धियों की फेहरिस्त में दर्ज किया,
हर मंत्री ने इसका उद्घाटन किया —
और हर बार जनता ने वही पुराना नज़ारा देखा —
फीता कटा, गड्ढे बढ़े।
ठेकेदार बदले, फाइलें आगे बढ़ीं, रकम खर्च हुई,
पर सड़क वहीं की वहीं, मानो विकास खुद गड्ढे में उतर गया हो।
प्रशासन की नाकामी इतनी कि अब सड़क की मरम्मत नहीं,
जनता के सब्र की मरम्मत जरूरी हो गई है।
नेताओं ने अब नया जादू खोज लिया —
“बाधा निवारक हवन”।
कहा गया, अग्नि देवता प्रसन्न होंगे, तो सड़क भी बनेगी!
जनता ने ताली बजाई, क्योंकि अब हंसी ही एकमात्र इलाज बचा है।
एमपीआरडीसी के अफसरों ने भी माथे पर तिलक लगाया —
जैसे स्वीकृतियों के ढेर में दबा “प्रोजेक्ट” अब स्वर्ग चला गया हो।
कोई ठेकेदार ग़ायब, कोई इंजीनियर ट्रांसफर —
और बीच में जनता, जो अब सवारी नहीं करती, बल्कि तैरती है सड़क पर।
सांसद बोले — “जहां श्रद्धा होती है, वहां सफलता आती है।”
जनता ने कहा — “हमारी श्रद्धा तो हर बारिश में बह जाती है।”
कहीं से खबर आई — 12 करोड़ खर्च हुए मरम्मत पर,
पर गड्ढे इतने गहरे हैं कि शायद वो रकम वहीं समा गई।
राजनीति ने इस सड़क को मंच बना लिया है —
हर नेता यहां से विकास का वादा लेकर निकलता है,
और पांच साल बाद वोट का रिटर्न टिकट लेकर लौट आता है।
अब सवाल यह नहीं कि NH-39 कब बनेगी,
सवाल यह है कि —
क्या सड़कें बनने से पहले अब पूजा-पाठ और प्रपंच का टेंडर पास होता है?
जनता थकी नहीं, आदत डाल ली है —
क्योंकि सीधी से सिंगरौली तक का सफर अब सिर्फ दूरी नहीं,
एक राजनीतिक तीर्थयात्रा बन चुका है —
जहां विकास की हर उम्मीद,
गड्ढे में ही समाधि ले लेती है।








