???? सीधी – लो पुत गई कालिख, अब जनता के सब्र ने भी ले लिया डिस्चार्ज!
सीधी की स्वास्थ्य व्यवस्था पर जितनी धूल जमी थी, उतनी तो डॉक्टर साहब के चेहरे पर कालिख पोते जाने के बाद उड़ गई।
शिवसेना के प्रदेश उपाध्यक्ष विवेक पांडेय ने जनता की लाइलाज व्यवस्था का ऐसा इलाज किया कि पूरा जिला अब “ब्लैक थेरैपी” पर चर्चा कर रहा है।
अस्पतालों में मरीज तड़पते रहे, डॉक्टर साहब सरकारी ड्यूटी छोड़ निजी क्लीनिक में मरीजों की किस्तों में करुणा बांटते रहे। जनता फाइलों में मरती रही, और कुर्सियों पर बैठे लोग “सुधार की रिपोर्ट” बनाते रहे — बिना सुधार के।
कहते हैं, डॉक्टर भगवान होते हैं,
पर अब जनता पूछ रही है — “कौन-सा भगवान, सरकारी या प्राइवेट वाला?”
विवेक पांडेय ने जो किया, वो कानून से ज़्यादा आक्रोश का उपचार था।
कालिख दरअसल चेहरे पर नहीं, व्यवस्था पर पोती गई — उस व्यवस्था पर जो हर रिपोर्ट में स्वस्थ बताई जाती है, लेकिन हकीकत में वेंटिलेटर पर पड़ी है।
डॉक्टर साहब पर आरोप है कि अस्पताल के टाइम पर क्लीनिक में थे।
यानी जनता अस्पताल में लाइन में थी, और डॉक्टर साहब मुनाफे की लाइन में!
अब सोशल मीडिया पर आंदोलन है, अस्पताल में सन्नाटा।
सरकारी स्वास्थ्य विभाग के नाम पर जो खेल चल रहा है, उसमें मरीज कम, मुनाफा ज़्यादा जिंदा है।
और जनता सोच रही है —
“अगर हर बार इलाज के लिए आंदोलन करना पड़े,
तो अगला वार्ड ‘शिवसेना शाखा’ ही खोल दी जाए!” ????
???? कुल मिलाकर अब हाल ऐसा है कि बीमारी से नहीं, व्यवस्था से डर लगने लगा है — क्योंकि यहां इलाज से पहले इजाजत, और मरने के बाद बहाना लिखा जाता है!








