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MP: में घोषणाओं की परेड,अवकाश लापता

घोषणाओं की परेड, अवकाश लापता: वर्दी में ड्यूटी जारी, छुट्टी अब भी सपना

भोपाल।
प्रदेश में यदि किसी घोषणा की उम्र सबसे लंबी और अमल सबसे छोटा रहा है, तो वह है पुलिसकर्मियों के साप्ताहिक अवकाश की घोषणा। हालात ऐसे हैं कि एक नहीं, दो नहीं, बल्कि तीन मुख्यमंत्रियों और एक गृह मंत्री की घोषणाएं फाइलों और मंचों से आगे बढ़ ही नहीं पाईं। नतीजा यह कि आरक्षक से लेकर थाना प्रभारी तक, करीब 70 हजार मैदानी पुलिसकर्मी आज भी छुट्टी नहीं, बल्कि सिर्फ ड्यूटी जानते हैं।

वर्ष 2014 में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पहली बार मंच से कहा था कि पुलिसकर्मियों को साप्ताहिक अवकाश मिलेगा। पुलिसकर्मियों ने राहत की सांस ली, लेकिन अवकाश कागजों में ही रह गया। फिर 2019 में कांग्रेस सरकार के दौरान मुख्यमंत्री कमल नाथ ने वही घोषणा दोहराई। कुछ समय तक अमल भी हुआ, पर पुलिस बल की कमी ने छुट्टी को फिर से “अतिथि” बना दिया। एक साल भी नहीं बीता कि अवकाश व्यवस्था बंद कर दी गई।

इतना ही नहीं, अगस्त 2020 में फिर भाजपा सरकार लौटी और शिवराज सिंह चौहान ने दोबारा साप्ताहिक अवकाश का एलान कर दिया। कुछ जिलों में रोस्टर भी बने, पुलिसकर्मियों को लगा कि अब तो सच में छुट्टी मिलेगी, लेकिन धीरे-धीरे यह व्यवस्था भी दम तोड़ गई। 2021 में तत्कालीन गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने भी भरोसा दिलाया कि पुलिसकर्मियों को साप्ताहिक अवकाश मिलेगा, मगर भरोसा एक बार फिर ड्यूटी की भीड़ में दब गया।

अब वर्तमान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव भी इस घोषणा की सूची में शामिल हो चुके हैं। एक साल बीत चुका है, लेकिन हालात जस के तस हैं। उप पुलिस अधीक्षक और उससे ऊपर के अधिकारियों को तो अवकाश मिल रहा है, पर आरक्षक, प्रधान आरक्षक, एएसआई, एसआई और निरीक्षक संवर्ग के मैदानी अधिकारी आज भी “साप्ताहिक अवकाश” शब्द को सिर्फ आदेशों में पढ़ते हैं।

जिलों में अवकाश रोस्टर बनाने की जिम्मेदारी पुलिस अधीक्षकों को दी गई थी, लेकिन बल की कमी ने सारी योजना पर पानी फेर दिया। प्रदेश में आरक्षक से लेकर एएसपी तक के कुल 1 लाख 26 हजार पदों में से 25 हजार से अधिक पद रिक्त हैं। नए थाने तो बन रहे हैं, लेकिन उस अनुपात में पुलिस बल नहीं बढ़ रहा। अपराध और आबादी बढ़ रही है, ड्यूटी का बोझ बढ़ रहा है, और अवकाश घटते-घटते शून्य पर आ गया है।

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दिलचस्प यह है कि इस पूरे मुद्दे पर प्रदेश के डीजीपी कैलाश मकवाणा की ओर से भी कोई स्पष्ट जवाब सामने नहीं आया। उधर, अन्य राज्यों की तुलना की जाए तो तस्वीर और चुभने वाली है। कर्नाटक सरकार ने हाल ही में पुलिसकर्मियों को जन्मदिन और शादी की सालगिरह पर अवकाश देने का फैसला किया है। वहीं तमिलनाडु में तो एक पुलिसकर्मी को साप्ताहिक अवकाश के लिए हाई कोर्ट की शरण लेनी पड़ी। हरियाणा में भी 2016 में घोषणा हुई थी, पर अमल वहां भी नहीं हुआ।

कुल मिलाकर, मध्य प्रदेश की पुलिस के लिए साप्ताहिक अवकाश अब एक व्यंग्य बन चुका है। मंच से घोषणाएं होती रहीं, अखबारों में सुर्खियां बनीं, लेकिन जमीन पर वर्दी पहनने वाला सिपाही आज भी बिना छुट्टी के कानून-व्यवस्था संभाल रहा है। सवाल यही है कि आखिर पुलिसकर्मियों की यह “घोषणात्मक छुट्टी” कब हकीकत बनेगी, या फिर यह भी अन्य अधूरी घोषणाओं की फेहरिस्त में दर्ज होकर रह जाएगी।

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