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Sidhi:योजनाओं की छाया में छूटती

Sidhi:योजनाओं की छाया में छूटती एक मासूम की जरूरत

सीधी-कुसमी स्थित सीएम राइज संदीपनी विद्यालय से सामने आया यह दृश्य केवल एक खबर नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था के दावों और जमीनी सच्चाई के बीच गहराते अंतर का मार्मिक मंथन है। कक्षा पांचवीं में अध्ययनरत, दोनों पैरों से दिव्यांग एक मासूम बच्ची का कबाड़ के ढेर में बैठकर स्कूल बैग और कॉपियां तलाशना व्यवस्था के चेहरे से पर्दा हटा देता है। जिस उम्र में बच्चों के हाथों में किताबें और कंधों पर सपने होने चाहिए, उसी उम्र में यह बच्ची अपनी पढ़ाई को बचाने के लिए कबाड़ बिन तक पहुंचने को मजबूर नजर आई।

यह दृश्य जितना संवेदनशील है, उतना ही सोचने पर विवश करने वाला भी। शासन स्तर पर शिक्षा के लिए बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। सीएम राइज जैसे विद्यालयों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, बेहतर सुविधाओं और समग्र विकास का प्रतीक बताया जाता है। बच्चों को पुस्तकें, ड्रेस और मध्यान्ह भोजन देने की योजनाएं वर्षों से चल रही हैं। लेकिन इस तस्वीर में एक दिव्यांग बच्ची बैग और कॉपी के अभाव में कबाड़ खंगालती दिखाई देती है, तो सवाल उठता है कि योजनाओं की चमक जमीनी हकीकत तक क्यों नहीं पहुंच पा रही।

विद्यालय प्रबंधन की ओर से यह स्पष्ट किया गया कि शासन द्वारा इस वर्ष केवल ड्रेस के लिए बच्चों के खातों में राशि भेजी जा रही है, वह भी सीमित। कॉपी, पेन और स्कूल बैग जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए कोई अलग सहायता नहीं है। शायद कागजों में यह कमी एक सामान्य प्रशासनिक तथ्य हो, लेकिन व्यवहार में इसका असर सबसे ज्यादा गरीब, कमजोर और दिव्यांग बच्चों पर पड़ता है। जिन परिवारों के लिए दो वक्त की रोटी जुटाना चुनौती हो, वहां से पढ़ाई के लिए अतिरिक्त खर्च की उम्मीद करना बच्चों को अनजाने में पढ़ाई से दूर धकेलने जैसा है।

प्रशासन द्वारा मामले में संज्ञान लिया जाना निश्चित रूप से एक सकारात्मक कदम है। एसडीएम द्वारा जांच के आदेश और बच्ची के परिवार को समझाइश देने की बात यह दर्शाती है कि व्यवस्था पूरी तरह संवेदनहीन नहीं है। लेकिन सवाल केवल एक बच्ची का नहीं है। यह उस पूरे वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है, जो योजनाओं के दायरे में तो शामिल है, पर वास्तविक लाभ से अक्सर वंचित रह जाता है।

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यह घटना बताती है कि शिक्षा केवल भवन, नामकरण और योजनाओं से नहीं चलती। शिक्षा का आधार बच्चों की बुनियादी जरूरतें हैं। जब तक एक बच्चा बिना डर, बिना शर्म और बिना मजबूरी के किताबें कंधे पर रखकर स्कूल नहीं जा पाता, तब तक शिक्षा के दावे अधूरे ही रहेंगे। खासकर दिव्यांग और गरीब बच्चों के लिए अतिरिक्त संवेदनशीलता और सहयोग की आवश्यकता होती है, जिसे सामान्य प्रावधानों में अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।

कुसमी की यह मासूम बालिका किसी एक विद्यालय या एक क्षेत्र की कहानी नहीं है। यह उस व्यवस्था का आईना है, जहां एक ओर शिक्षा को भविष्य की कुंजी बताया जाता है, वहीं दूसरी ओर उसी भविष्य को ढोने वाले बच्चे संसाधनों के लिए जूझते नजर आते हैं। यदि समय रहते इस अंतर को नहीं पाटा गया, तो योजनाओं की फाइलों में दर्ज सफलता और जमीन पर दिखने वाली सच्चाई के बीच की खाई और गहरी होती चली जाएगी।

यह मंथन केवल आलोचना नहीं, बल्कि चेतावनी है। एक ऐसी चेतावनी कि यदि शिक्षा को सच में सबके लिए सुलभ बनाना है, तो नीतियों के साथ संवेदनशीलता, और घोषणाओं के साथ जिम्मेदारी भी उतनी ही जरूरी है। तभी कोई बच्ची अपने स्कूल बैग की तलाश में कबाड़ नहीं, बल्कि सपनों की दुनिया में कदम रख सकेगी।

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