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बनास नदी पर पिकनिक या प्रदूषण? परसिली-नोडिया की प्राकृतिक संकट मे

बनास नदी के तट पर क्या पिकनिक प्रकृति की कीमत पर होगी?

परसिली रिसॉर्ट के निकट ग्राम नोडिया का कठ बंगला और सिसकती प्राकृतिक धरोहर

मध्यप्रदेश के सीधी जिले में संजय टाइगर रिजर्व की गोद में बसे परसिली रिसॉर्ट ने पिछले कुछ वर्षों में प्रकृति प्रेमियों और पर्यटकों के बीच अपनी एक अलग पहचान बनाई है। घने साल के वन, वन्यजीवों की उपस्थिति, शांत वातावरण और कल-कल बहती बनास नदी इस क्षेत्र को अद्भुत प्राकृतिक सौंदर्य प्रदान करते हैं। परसिली रिसॉर्ट से कुछ दूरी पर ग्राम नोडिया स्थित है, जहाँ नदी तट पर बना पुराना कठ बंगला आज भी इस क्षेत्र के प्राकृतिक और ऐतिहासिक महत्व का साक्षी है। सप्ताहांत और अवकाश के दिनों में बड़ी संख्या में लोग यहाँ पिकनिक मनाने पहुँचते हैं। लेकिन अफसोस, लौटते समय वे अपने पीछे ऐसी विरासत छोड़ जाते हैं, जो इस धरोहर के लिए अभिशाप बनती जा रही है। प्लास्टिक का कचरा, डिस्पोजेबल बर्तन, पॉलीथिन, पानी और शीतल पेय की बोतलें तथा शराब की खाली बोतलें।https://sidhi24news.in/archives/30283

यह दृश्य केवल गंदगी का नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक और पर्यावरणीय संवेदनहीनता का आईना है। जिस नदी के किनारे बैठकर लोग प्रकृति की शांति का आनंद लेते हैं, उसी नदी के तट को वे कुछ ही घंटों में कूड़े के ढेर में बदल देते हैं। प्रकृति से प्रेम का दावा करने वाले पर्यटक अनजाने में उसी प्रकृति के सबसे बड़े शत्रु बन जाते हैं।

बनास नदी केवल जलधारा नहीं है। यह इस पूरे वन क्षेत्र की जीवनरेखा है। इसके तटों पर अनेक वनस्पतियाँ पनपती हैं, वन्यजीव पानी पीने आते हैं और पक्षियों का संसार आबाद रहता है। प्लास्टिक और अन्य अपशिष्ट पदार्थ वर्षों तक नष्ट नहीं होते। वे मिट्टी की उर्वरता को प्रभावित करते हैं, जल को प्रदूषित करते हैं और पशु-पक्षियों के जीवन के लिए खतरा बनते हैं। कई बार जंगली जानवर भोजन समझकर प्लास्टिक निगल लेते हैं, जिसके परिणाम घातक हो सकते हैं।

सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि यह क्षेत्र ईको-पर्यटन के रूप में विकसित किया जा रहा है। ईको-पर्यटन का मूल दर्शन यही है कि पर्यटक प्रकृति का आनंद लेने के साथ उसके संरक्षण में भी सहभागी बने। यदि पर्यटन के नाम पर जंगल और नदी को प्रदूषित किया जाएगा, तो यह विकास नहीं बल्कि विनाश होगा। स्वच्छ प्राकृतिक स्थल ही पर्यटन की सबसे बड़ी पूँजी हैं। यदि यह पूँजी नष्ट हो गई, तो आने वाले वर्षों में पर्यटक भी कम होंगे और स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर भी प्रभावित होंगे।

आज आवश्यकता केवल सफाई अभियान चलाने की नहीं, बल्कि व्यवहार परिवर्तन की है। वन विभाग, पर्यटन विभाग और स्थानीय प्रशासन को मिलकर कठ बंगला एवं बनास नदी तट पर कूड़ेदान, सूचना पट्ट और पर्यावरण संरक्षण संबंधी चेतावनी बोर्ड लगाने चाहिए। नियमित सफाई की व्यवस्था के साथ-साथ कचरा फैलाने वालों पर जुर्माना लगाने की व्यवस्था भी प्रभावी ढंग से लागू होनी चाहिए। स्थानीय युवाओं, विद्यालयों और सामाजिक संगठनों की भागीदारी से समय-समय पर स्वच्छता अभियान चलाकर लोगों में जागरूकता बढ़ाई जा सकती है।

परंतु सबसे बड़ी जिम्मेदारी पर्यटकों की है। हमें यह समझना होगा कि प्रकृति कोई पिकनिक स्पॉट भर नहीं, बल्कि हमारी साझा धरोहर है। यदि हम भोजन और अन्य सामग्री अपने साथ ला सकते हैं, तो उनका कचरा वापस ले जाना भी हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। “जो साथ लाएँ, उसे वापस भी ले जाएँ”। यदि हर पर्यटक इस एक सिद्धांत का पालन करे, तो बनास नदी का तट फिर से अपनी स्वाभाविक सुंदरता प्राप्त कर सकता है।

ग्राम नोडिया का कठ बंगला और बनास नदी का किनारा केवल स्थानीय पर्यटन स्थल नहीं हैं, बल्कि विंध्य अंचल की प्राकृतिक विरासत हैं। इन्हें स्वच्छ और सुरक्षित रखना सरकार, प्रशासन, स्थानीय समुदाय और पर्यटकों सभी की साझा जिम्मेदारी है। यदि आज हम नहीं चेते, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमसे यह प्रश्न अवश्य पूछेंगी कि हमने उन्हें हरे-भरे जंगल और स्वच्छ नदी क्यों नहीं सौंपी।https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=pfbid0EQWrWbcvX8Hw23vHVFHpcf13ay7ZPx9twW8KmduFmfia43xfKv93hSJEXK4cwEYVl&id=61553771941900&mibextid=ZbWKwL

आइए, संकल्प लें कि प्रकृति को केवल देखने नहीं, उसे बचाने भी जाएँ। पिकनिक की यादें साथ ले जाएँ, लेकिन कचरा नहीं छोड़ें। स्वच्छ बनास नदी ही इस क्षेत्र की सबसे बड़ी पहचान और आने वाली पीढ़ियों के लिए सबसे अनमोल विरासत है।

डॉ प्रमोद कुमार सिंह

पर्यटन विभाग, संजय गांधी स्मृति शासकीय स्वशासी स्नातकोत्तर महाविद्यालय सीधी

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