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Manrega aur masheen:मनरेगा में मनमानी का आलम,मजदूरों की जगह मशीनें कर रही काम

Manrega aur masheen:मनरेगा में मनमानी का आलम,मजदूरों की जगह मशीनें कर रही काम

– मजदूरों के खाते में हो रहा भुगतान,दलाल वापस ले रहे मजदूरी

सीधी- मनमानी के लिए बदनाम मनरेगा में कोई सुधार देखने को नहीं मिल रहा पंचायत के सरपंच सचिव और रोजगार सहायकों की मिली भगत के चलते मजदूर जहां दर-दर भटकने को मजबूर है वही मशीनों से पूरा का पूरा काम कराया जा रहा है हां मजदूरी के लिए मजदूरों के खातों का उपयोग जरूर किया जा रहा है जिनमें  चिन्हित लोगों के खातों में मजदूरी की राशि डालकर उसे वापस निकाल दिया जा रहा है ऐसा नहीं है कि इस बात से जिम्मेदार अधिकारी अफसर बेखबर है लेकिन अपना हिस्सा लेने के बाद वह भी चुप है और अब तो यह भी कहा जाता है कि यह सिस्टम का हिस्सा है कई बार शिकायत है जिला मुख्यालय तक पहुंचती है लेकिन जिम्मेदारों पर नोटिस की कार्यवाही कर उन्हें छोड़ दिया जाता है।

जी हां बता दे की गांव में ही लोगों को रोजगार देने के उद्देश्य से शुरू की गई मनरेगा मजदूरी अधिकारियों और पंचायत सरपंच सचिव और रोजगार सहायकों के लिए  आमदनी का जरिया बन गई है  यहां काम स्वीकृत होने के बाद मशीनों से जल्द से जल्द काम करवा लिया जाता है और संबंधित इंजीनियर और जनपद के आला अधिकारियों से साठ गांठ कर  काम का पैसा निकलवा लिया जाता है बात रही मनरेगा मजदूरी की तो चिन्हित लोगों के खातों में मजदूरी का पैसा डालने के बाद उसे वापस इन सब के द्वारा अहरित करवा लिया जाता है। गहनता से अगर जांच कराई जाए तो जिन लोगों के खातों में मनरेगा की मजदूरी जा रही है उनके द्वारा पंचायत में कभी कम ही नहीं किया गया लेकिन एक सिस्टम के तहत उन्हें बराबर मजदूरी का भुगतान किया जाता है कई बार तो यह भी देखने को आया है कि मृतकों के नाम पर मजदूरी का भुगतान कर दिया गया है जो कि अब इस दुनिया में है ही नहीं लेकिन सरकारी तंत्र में ऐसे अधिकारी और कर्मचारियों पर आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।

कागजी दुकानों में सामग्री का होता है भुगतान

पंचायत में होने वाले कार्यों में सामग्री खरीदी के नाम पर भी लंबा घोटाला चल रहा है यहां कागजों में दुकान संचालित है और उन्हें ही वेंडर बनाकर उनके नाम पर भुगतान किया जाता है कहीं जगह हो पर तो जनपद के कर्मचारी या फिर ग्राम पंचायत के सरपंच सचिव के द्वारा भी ऐसी दुकान कागज पर खोलकर रखी गई है जिनके नाम पर भुगतान का चेक काट कर राशि हरित कर ली जाती है जबकि अगर भुगतान किए गए संस्थान की खोज की जाए तो वास्तविकता के धरातल पर इनका अस्तित्व ही नहीं है कई जगह पर 100 किलोमीटर  दूर स्थित दुकान से सामग्री लाने के भी साक्षी मिल जाते हैं हालांकि शासन का नियम है की सामग्री कहीं से भी खरीदी जा सकती है लेकिन इसी नियम का दुरुपयोग करते हुए फर्जी भुगतान का खेल चल रहा है। और इन सब बातों की जानकारी संबंधित विभाग के अधिकारियों को भी है लेकिन उन्हें के संरक्षण में यह गोरख धंधा फल फूल रहा है लेकिन आज तक किसी ने इस और ध्यान देना उचित नहीं समझा।

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