Sidhi24news; कछुआ गति से चल रही चिह्नित गांवों के विस्थापन की प्रक्रिया इंसानी दखल से कब मुक्त होगा टाइगर रिजर्व….
सीधी /संजय टाइगर रिजर्व का कोर एरिया मुक्त नहीं हो पा रहा है। इसका परिणाम वन्य प्राणियों के साथ ही कोर एरिया में बसे गांव के लोगों भी भुगतना पड़ रहा है। वन्य प्राणियों को जहां विचरण के लिए पर्याप्त स्थान नहीं मिल पा रहा है, वहीं विस्थापन के लिए चिहिनत गांवों में रहने वाले परिवारों को जंगली पंटा जानवरों के हमले का शिकार होना पड़ता है।
50 से अधिक गांव होने हैं दर्जन गांवों का हो चुका है विस्थापन, पैकेज वितरण सवाल
बताते चलें कि संजय टाइगर रिजर्व अंतर्गत कोर जोन में बसे 54 गांवों को विस्थापन के लिए चिह्नित किया गया था। विभागीय दावों के अनुसार अब तक 17 गांवों का विस्थापन हो चुका है। पहला विस्थापन ग्राम कंजरा का वर्ष 2013-14 में हुआ था। इसके बाद कमशः कई गांव विस्थापित किए जा चुके हैं, लेकिन करीब आधा दर्जन को छोड़ दिया जाए राशि का नहीं अभाव तो सभी विस्थापित गांव पूरी तरह से इंसानी दखल से मुक्त नहीं हो पाए हैं। अभी भी यहां के परिवार गांव छोड़कर नहीं गए हैं, घर गिराने के बाद भी लोग झोपड़ी बनाकर रह रहे हैं और यहीं खेती बाड़ी का काम करते विस्थापन को लेकर राशि की समस्या नहीं है। अधिकारियों की माने तो पिछले दो वर्ष से विस्थापन मद के डेढ़ करोड़ रुपये से ज्यादा राशि खाते में डंप है, लेकिन विस्थापन प्रक्रिया पूर्ण नहीं हो पाने की स्थिति में राशि का वितरण पात्रों को नहीं हो पा रहा है
धूल खा रही दो गांव की फाइल
विभागीय सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार विस्थापन में तेजी न आने का सबसे बड़ा कारण राजस्व विभाग का सहयोग न मिलना बताया जा रहा है। अधिकारियों की माने तो रामगढ़ और दुबरी खुर्द गांव के विस्थापन की फाइल पिछले करीब छह माह से एडीएम कार्यालय में धूल खा रही है, लेकिन यहां से विस्थापन की प्रक्रिया कोआगे नहीं बढ़ाया जा रहा है। बढ़ा दी गई है पैकेज राशि हैं। कुछ परिवारों का तो आरोप है कि उन्हें विस्थापन पैकेज की राशि नहीं मिली है, इसलिए गांव नहीं छोड़ेंगे।
विस्थापित गांवों में बढ़ने लगी बसाहट
संजय टाइगर रिजर्व एरिया के विस्थापन के विहिनत गांवों के विस्थापन की प्रक्रिया कछुए की गति से चल रही है। पहला गांव कंजरा वर्ष 2013-14 में विस्थापित हो गया था। उसके बाद से अब तक महज 16 और गांव विस्थापित हो पाए हैं। विस्थापन की प्रक्रिया धीमी गति से चलने के कारण विस्थापित गांवों में दुबारा बसाहट बढ़ने लगी है। लोग गांव में झोपड़ी बनाकर रहते हैं।
विस्थापन को लेकर सबसे बड़ी समस्या निर्धारित पैकेज राशि थी। शासन स्तर से मूल निवासी परिवार को विस्थापन के लिए 10 लाख रुपए का पैकेज निर्धारित किया गया था। जिसका लगातार विरोध किया जा रहा था। विधायक धौहनी के हस्तक्षेप के बाद शासन स्तर से विस्थापन के पैकेज की राशि 10 लाख से बढ़ाकर 15 लाख प्रति परिवार कर दी गई थी। जिससे इस समस्या का भी समाधान हो गया, बावजूद विस्थापन की प्रक्रिया तेज नहीं हो पाई।









