मध्यप्रदेश: भ्रष्ट अफसर-कर्मचारियों पर अभियोजन की प्रक्रिया में बड़ा बदलाव
मध्यप्रदेश सरकार ने भ्रष्टाचार और घूसखोरी से जुड़े मामलों में अभियोजन प्रक्रिया को तेज और पारदर्शी बनाने के लिए अहम बदलाव किए हैं। अब अभियोजन पर सहमति या असहमति के लिए तीन महीने (90 दिन) की समय-सीमा तय कर दी गई है। सामान्य प्रशासन विभाग ने इस संबंध में सोमवार देर रात आदेश जारी किए।
प्रमुख बदलाव
1. नियुक्तिकर्ता अधिकारी को अधिकार
- अब भ्रष्टाचार या घूसखोरी के मामलों में अभियोजन स्वीकृति सीधे नियुक्तिकर्ता अधिकारी दे सकेंगे।
- उदाहरण: पंचायत सचिव के खिलाफ मामला हो तो जिला पंचायत सीईओ निर्णय ले सकेंगे।
- विभागीय स्वीकृति की आवश्यकता समाप्त कर दी गई है, जिससे मामले सरकार तक न जाएं और प्रक्रिया तेज हो।
- विधि विभाग से अभिमत (राय) लेना अनिवार्य होगा।
2. कैबिनेट के लिए 45 दिन की समय-सीमा
- यदि नियुक्तिकर्ता अधिकारी असहमत हैं, तो मामला विधि विभाग को भेजा जाएगा।
- विधि विभाग की राय से सहमति न बनने की स्थिति में मामला कैबिनेट के पास जाएगा।
- अब कैबिनेट को 45 दिनों के भीतर निर्णय लेना होगा।
3. निजी परिवाद के मामलों में सुनवाई
- किसी अफसर या कर्मचारी के खिलाफ निजी शिकायत आने पर उनका पक्ष सुनना अनिवार्य होगा।
- सुनवाई के बाद तीन महीने के भीतर प्रकरण का निराकरण करना होगा।
नई प्रक्रिया का समय-सीमा
- नियुक्तिकर्ता अधिकारी द्वारा सहमति/असहमति: 45 दिन
- कैबिनेट द्वारा निर्णय: 45 दिन
- कुल समय-सीमा: 90 दिन
अब तक की स्थिति
- अभियोजन स्वीकृति में विभागीय अनुमति जरूरी होती थी, जिससे छोटे-बड़े सभी मामले सरकार तक पहुंचते थे और समय अधिक लगता था।
- विधि विभाग से राय लेना अनिवार्य नहीं था।
- कैबिनेट में मामलों के निपटारे की कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं थी।
सरकार का उद्देश्य
इन बदलावों से भ्रष्टाचार के मामलों में कार्रवाई तेज होने की उम्मीद है। सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों में देरी को रोकने और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की दिशा में यह एक अहम कदम माना जा रहा है।








