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जंगली हाथियों का आतंक बना आमजन की मुसीबत, बिचौलियों की चांदी – अफसरों की सह पर चल रही दलाली

जंगली हाथियों का आतंक बना आमजन की मुसीबत, बिचौलियों की चांदी – अफसरों की सह पर चल रही दलाली

संजय टाइगर रिजर्व क्षेत्र के ग्रामीणों पर दोहरी मार पड़ रही है—एक तरफ जंगली हाथियों का कहर थमने का नाम नहीं ले रहा, तो दूसरी ओर विस्थापन प्रक्रिया में बिचौलियों की खुली लूट चल रही है। अफसरों की मिलीभगत से दलालों का खेल इस कदर मजबूत हो चुका है कि बिना उनकी ‘मर्जी’ के किसी पीड़ित को राहत या विस्थापन पैकेज तक नहीं मिल पाता।

ताजा मामला ग्राम गाजर का है, जहां बीती रात हाथियों के झुंड ने एक मकान को तोड़ डाला और घर में रखी गेहूं की बोरियों को चट कर गए। रमेश मिश्रा नामक ग्रामीण अपने परिवार के साथ किसी तरह जान बचाकर भागे, लेकिन घर का सारा सामान बर्बाद हो गया।

घटनाएं लगातार, मुआवजा नदारद

इस क्षेत्र में हाथियों के हमले अब आम हो चले हैं, लेकिन प्रशासन की नींद अब तक नहीं टूटी। कई पीड़ितों को आज तक मुआवजा नहीं मिला है। ग्रामीणों का कहना है कि बार-बार आवेदन देने के बावजूद उन्हें सिर्फ आश्वासन ही मिलता है।

विस्थापन प्रक्रिया में दलाली का बोलबाला

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि विस्थापन जैसी गंभीर प्रक्रिया में भी दलालों की दुकानें चल रही हैं। ग्रामीणों का कहना है कि बिना ‘सेटिंग’ के फाइल आगे नहीं बढ़ती। जिनके पास पैसे नहीं हैं, उन्हें अफसरों के चक्कर काटने पड़ते हैं, जबकि पैसे देकर दलालों के माध्यम से आवेदन करने वाले सीधे सूची में जगह पा लेते हैं।

अफसरों की मौन स्वीकृति से फल-फूल रहे बिचौलिए

स्थानीय लोग साफ तौर पर आरोप लगा रहे हैं कि अफसरों की मौन स्वीकृति के बिना इतनी खुली दलाली संभव नहीं है। कई मामले ऐसे भी हैं जिनमें कोर्ट से विस्थापन का आदेश मिल चुका है, फिर भी कार्रवाई नहीं हो रही। यह स्थिति साफ दर्शाती है कि प्रशासनिक मशीनरी खुद इस भ्रष्टाचार की हिस्सेदार बनी हुई है।

विपक्ष भी खामोश, जनता असहाय

इस पूरे प्रकरण में विपक्ष की भी भूमिका संदिग्ध है। न तो कोई जनप्रतिनिधि सक्रियता दिखा रहा है और न ही कोई ठोस सवाल उठाया जा रहा है। नतीजतन, जंगली जानवरों के बीच जिंदगी बिताने को मजबूर ग्रामीण खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।


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