असम में सत्ताधारी गठबंधन की घटती लोकप्रियता के बीच, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की जूनियर सहयोगी पार्टी असम गण परिषद (AGP) को आगामी चुनावों में पिछले चुनावों के समान ही सीटें मिलने का फैसला किया गया है। हालांकि, सतही आंकड़े तो पार्टी की स्थिति को स्थिर दिखाते हैं, लेकिन गहराई से किए गए विश्लेषण में AGP की जमीन धीरे-धीरे कमजोर होती नजर आ रही है।
विस्तृत विश्लेषण के मुताबिक, AGP ने पिछले विधानसभा चुनावों में जहां निश्चित सीटें जीतीं, इस बार भी उतनी ही सीटें लड़ने का मौका मिलेगा। लेकिन क्षेत्रीय स्तर पर वोट प्रतिशत में गिरावट और स्थानीय मतदाताओं की बदलती प्राथमिकताएं इस बात का संकेत दे रही हैं कि पार्टी की पकड़ पहले जैसी मजबूत नहीं रही।
राजनीतिक टिप्पणीकारों का मानना है कि AGP के लिए यह समय चुनौतीपूर्ण है क्योंकि उनके परंपरागत समर्थक अब भाजपा और अन्य क्षेत्रीय पार्टियों के बीच दुविधा में हैं। इसके अलावा, नए युवा मतदाता अलग-अलग मुद्दों पर ज्यादा संवेदनशील और जागरूक हो गए हैं, जिससे AGP को अपनी नीतियों और जनसंपर्क में तेजी लानी जरूरी है।
पिछले कुछ वर्षों में पार्टी ने कई संगठनों और सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाई है, लेकिन मौजूदा राजनीतिक माहौल में यह पर्याप्त साबित नहीं हो रहा। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि चुनाव पूर्व जनमत सर्वेक्षण और स्थानीय स्तर की जनसंवाद रणनीतियों पर पार्टी को अधिक ध्यान देना होगा, ताकि वह वोटरों के विश्वास को पुनः हासिल कर सके।
वहीं भाजपा के साथ गठबंधन के चलते AGP को सीमित अवसर मिलते हुए भी अपना असर बनाए रखना होगा। गठबंधन रणनीतिकारों के अनुसार, सीट आवंटन तो स्थिर है, लेकिन चुनाव प्रचार और मतदाता संपर्क में नवीन तरीकों का उपयोग करके AGP को अपनी स्थिति मजबूत करनी होगी।
स्थानीय मुद्दे जैसे बेरोजगारी, शिक्षा, बुनियादी सुविधाओं का अभाव और सामाजिक समरसता असम के मतदाताओं की प्राथमिकता बन चुके हैं। AGP यदि इस चुनाव में इन मुद्दों पर प्रभावी संवाद स्थापित करता है तो वह अपनी गिरावट को रोक सकता है।
चुनाव परिणाम भविष्य में बताएंगे कि AGP की यह मरम्मत रणनीतियां कितनी कारगर साबित होती हैं। फिलहाल, विश्लेषकों का ध्यान इस बात पर है कि सतह के आंकड़े जैसे सीट आवंटन, पार्टी की सच्ची राजनीतिक दशा को छुपा सकते हैं। असम की राजनीति में इस गठबंधन के अंदरूनी बदलावों की निगरानी इस बार कड़ी रहेगी।








