पंचायत में नौकरी भी, वेंडरशिप भी! रोजगार सहायक के नाम ₹67,500 भुगतान पर ग्रामीणों का सवाल—“जांच हो तो पता चले असली खेल”
सीधी। पंचायत व्यवस्था में जिम्मेदारियां निभाने का अंदाज भी अब शायद बदल गया है। कुसमी जनपद पंचायत अंतर्गत ग्राम पंचायत कुसमी में रोजगार सहायक को कथित तौर पर पंचायत का वेंडर बनाए जाने और उसके नाम पर अब तक ₹67,500 के भुगतान का आरोप सामने आया है। मामला उजागर होने के बाद ग्रामीण सवाल उठा रहे हैं कि आखिर पंचायत में पद भी और पंचायत का वेंडर भी—यह कैसा इंतजाम है?
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ग्रामीणों के अनुसार, पंचायत दर्पण पोर्टल पर रोजगार सहायक का नाम वेंडर के रूप में दर्ज होने की बात सामने आई है। आरोप है कि इसके बाद अलग-अलग मदों में करीब ₹6 हजार, ₹3 हजार, ₹10 हजार समेत कुल ₹67,500 की राशि का भुगतान किया गया। अब ग्रामीणों की मांग है कि कागजों की परतें हटाकर देखा जाए कि सामान क्या खरीदा गया, किससे खरीदा गया, बिल क्या हैं और भुगतान किन नियमों के तहत हुआ?

“पहले नौकरी, फिर वेंडर… कहीं एक ही कुर्सी पर दो-दो भूमिकाएं तो नहीं?”
ग्रामीणों का कहना है कि रोजगार सहायक पंचायत में जिम्मेदारीपूर्ण पद पर कार्यरत हैं। ऐसे में उन्हें पंचायत का वेंडर बनाए जाने की पात्रता और औचित्य की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। ग्रामीण तंज कसते हुए पूछ रहे हैं कि जिस व्यवस्था में निगरानी और प्रक्रिया का हिस्सा बनने वाला व्यक्ति ही वेंडर की भूमिका में नजर आए, वहां पारदर्शिता का हिसाब कौन देगा?
हालांकि, इन आरोपों की सत्यता और भुगतान प्रक्रिया की वैधता आधिकारिक जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।
सचिव की भूमिका पर भी उठे सवाल
मामले में पंचायत सचिव की भूमिका को लेकर भी ग्रामीणों ने सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि भुगतान से पहले खरीदी गई सामग्री, बिल, वेंडर की पात्रता और अन्य दस्तावेजों का सत्यापन होना चाहिए। ग्रामीणों का आरोप है कि यदि प्रक्रिया में किसी प्रकार की अनियमितता हुई है तो इसकी जवाबदेही भी तय की जानी चाहिए।
ग्रामीणों का कहना है—“कागजों में सब कुछ सही है या कागज ही कहानी सुना रहे हैं, यह जांच के बाद सामने आना चाहिए।”
सरपंच-पंचों की मौजूदगी में जांच की मांग
ग्रामीणों ने मांग की है कि ग्राम पंचायत कुसमी में संबंधित सभी भुगतानों, वेंडर पंजीयन, खरीदी, बिल और भुगतान प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच कराई जाए। साथ ही जांच सरपंच एवं पंचों की उपस्थिति में कराने की मांग की गई है, ताकि बाद में कोई यह न कह सके कि जांच भी हुई और मामला भी फाइलों में ही बह गया।
अब बड़ा सवाल यही है कि ₹67,500 का यह भुगतान पूरी तरह नियमों के अनुरूप है या पंचायत की व्यवस्था में कहीं कोई गड़बड़ी हुई है? इसका जवाब निष्पक्ष और दस्तावेज आधारित जांच के बाद ही सामने आएगा।
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