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मुख्य सचिव बन बैठे ‘मुख्य शरारती’, कलेक्टर की सूझबूझ से उड़ गई ठगों की हवाईयां

मुख्य सचिव बन बैठे ‘मुख्य शरारती’, कलेक्टर की सूझबूझ से उड़ गई ठगों की हवाईयां

सिंगरौली। प्रशासनिक कुर्सियों की नकल करने वालों की अब नई किस्म सामने आई है — ये लोग अब “मुख्य सचिव” भी बन जाते हैं! जी हां, सिंगरौली कलेक्टर को फोन कर खुद को मुख्य सचिव, मध्यप्रदेश शासन बताने वाले तीन फर्जी अफसर आखिरकार पुलिस की गिरफ्त में हैं।

मामला सुनने में जितना मज़ेदार है, उतना ही गंभीर भी। कलेक्टर के शासकीय मोबाइल नंबर पर एक साहब ने फोन किया और बोले — “मैं मुख्य सचिव बोल रहा हूं, एक जरूरी काम तुरंत करवाना है।”
कलेक्टर साहब ने भी विनम्रता से सुना, लेकिन अनुभव के तराजू पर बातों को तौला — और कुछ गड़बड़ लगी। उन्होंने तुरंत थाना बैढ़न को सूचना दी। बस फिर क्या था, कुछ ही घंटों में फर्जी “मुख्य सचिव” और उनके साथी असली हथकड़ियों के साथ सामने थे।

पुलिस जांच में खुलासा हुआ कि भोपाल निवासी 24 वर्षीय सचिन मिश्रा इस “महान अभियान” का मास्टरमाइंड था। उसके पिता बी.पी. मिश्रा और सहयोगी सचिन्द्र तिवारी भी उसके “प्रशासनिक दल” में शामिल थे। पुलिस ने तीनों को गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया।

बताया जा रहा है कि आरोपी डीएमएफ से जुड़ा कोई काम निकलवाना चाहते थे। लेकिन वे भूल गए कि सिंगरौली के कलेक्टर फोन पर नहीं, प्रमाण पर विश्वास करते हैं। उनकी सतर्कता से न सिर्फ बड़ा फर्जीवाड़ा पकड़ा गया, बल्कि शासन की साख भी बच गई।

इस पूरे घटनाक्रम में कलेक्टर की त्वरित सोच और प्रशासनिक सतर्कता प्रशंसनीय रही। वरना आज के डिजिटल युग में कोई भी “मुख्य सचिव” बनकर कुछ भी करा जाता।

अब सवाल यह है कि इतने ‘टैलेंटेड’ ठग अगर अपनी बुद्धि सही जगह लगाते, तो शायद आज वे साक्षात्कार दे रहे होते, गिरफ्तारी नहीं!

अंत में यही कहा जा सकता है —
“कलेक्टर की सूझबूझ से बच गई प्रशासन की गरिमा,
वरना फर्जीवाड़ों का नया मंत्रालय खुलने वाला था सिंगरौली में।”

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