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संजय टाइगर रिजर्व में वन्यजीवों पर खतरा: कोर एरिया में बेरोकटोक मानवीय दखल

संजय टाइगर रिजर्व में वन्यजीवों पर खतरा: कोर एरिया में बेरोकटोक मानवीय दखल, विस्थापन की धीमी रफ्तार और वन विभाग की लापरवाही बनी बड़ी चुनौती

सीधी।
मध्यप्रदेश के सीधी जिले में स्थित संजय टाइगर रिजर्व एक समय में दुर्लभ और संरक्षित वन्यजीवों के लिए जाना जाता था, लेकिन वर्तमान में यह क्षेत्र कई संकटों से जूझ रहा है। बाघों की बढ़ती संख्या और जैव विविधता के बावजूद यहां के कोर एरिया में ग्रामीणों का बेरोकटोक आना-जाना, वनोपज का अवैध दोहन, आगजनी, जलस्रोतों की बदहाली और विभागीय लापरवाही ने इस रिजर्व की स्थिति को बेहद चिंताजनक बना दिया है।


कोर एरिया में धड़ल्ले से हो रहा मानवीय हस्तक्षेप

वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत कोर एरिया को अति संरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया है, जहां आम नागरिकों का प्रवेश पूरी तरह निषिद्ध है। इसके बावजूद रोजाना हजारों ग्रामीण महुआ बीनने, तेंदूपत्ता तोड़ने और लकड़ी संग्रह के लिए कोर क्षेत्र में प्रवेश कर रहे हैं। कई ग्रामीण 10 किलोमीटर दूर के गांवों से जंगल में कैंप लगाकर रह रहे हैं। इससे न केवल बाघ जैसे खूंखार वन्यजीवों के प्राकृतिक रहवास में विघ्न पड़ रहा है, बल्कि खुद ग्रामीणों की जान भी खतरे में है। कई बार इंसान और जानवरों के बीच संघर्ष देखने कोमल चुका है जिसमें कई लोगों की जानभ जा चुकी है और कई जानवर भी मारे जा चुके हैं।


आगजनी और वन क्षेत्र का विनाश

महुआ बीनने के दौरान ग्रामीण पेड़ों के नीचे पत्तियां साफ करने के लिए आग लगा देते हैं, जो अनियंत्रित होकर हजारों हेक्टेयर वन क्षेत्र को खाक कर देती है। हाल ही में पेंड्रा ताल से बघनाद और बहेरवार में आगजनी की घटनाओं से बाघों के सर्वोत्तम रहवास क्षेत्र जलकर नष्ट हो गए। दुख की बात यह है कि बीट गार्ड, चौकीदार और फायर वॉचर इन घटनाओं के दौरान मौजूद तक नहीं थे।


विस्थापन की धीमी रफ्तार और ग्रामीणों की वापसी

सरकार ने कोर क्षेत्र के गांवों के विस्थापन के लिए योजनाएं बनाई थीं और कई ग्रामीणों को मुआवजा भी प्रदान किया गया। लेकिन पुनर्वास की व्यवस्था अधूरी और असुविधाजनक रही। मुआवजा मिलने के बावजूद रोज़गार, स्कूल, स्वास्थ्य सुविधा और भूमि जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं मिलीं, जिससे विस्थापित परिवार दोबारा जंगलों की ओर लौटने लगे। यह स्थिति न केवल योजना की विफलता दर्शाती है, बल्कि वन्यजीवों के लिए फिर से खतरे की घंटी भी है।


जल संकट और बिखरी जल प्रबंधन व्यवस्था

गर्मियों में जंगल के जल स्रोत सूख जाते हैं। रिजर्व में बनाए गए कृत्रिम जल स्रोत या तो खराब हैं या पूरी तरह उपेक्षित। टैंकरों से जल भरने की व्यवस्था अनियमित हो गई है। सोलर पैनल के सहारे बनाए गए जलस्रोतों में से 80% खराब पड़े हैं। किसी को हाथियों ने तोड़ा, किसी को बंदरों ने, और अधिकांश रखरखाव के अभाव में जर्जर हो चुके हैं।


वन विभाग की गैरजिम्मेदारी और निष्क्रियता

वन विभाग के मैदानी कर्मचारी अक्सर ड्यूटी से गायब रहते हैं। बीट गार्ड बिना अनुमति के शादियों में चले जाते हैं और जंगल की निगरानी पूरी तरह ठप रहती है। छोटी-बड़ी अवैध गतिविधियों पर कोई रोक नहीं लगाई जाती। अधिकारियों की निष्क्रियता और ढुलमुल रवैये के कारण स्थिति हर दिन बद से बदतर होती जा रही है।


छोटे वन्यजीव उपेक्षित, शिकार की घटनाएं आम

रिजर्व क्षेत्र में चीतल, खरगोश, नीलगाय, साही जैसे छोटे वन्यजीव बड़ी संख्या में मौजूद हैं, लेकिन उनकी निगरानी नहीं होती। ये जीव आबादी क्षेत्रों तक भटक जाते हैं और कई बार शिकार का शिकार बन जाते हैं। वन विभाग इस ओर गंभीर नहीं दिखता, जिससे जैव विविधता को स्थायी नुकसान पहुंच रहा है।

संजय टाइगर रिजर्व की यह स्थिति वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरण संतुलन के लिए गंभीर खतरा बन चुकी है। अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो यह रिजर्व नाम मात्र का रह जाएगा। क्या सरकार, वन विभाग और स्थानीय प्रशासन मिलकर इस संकट से उबरने की जिम्मेदारी लेंगे? क्या विस्थापन योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू किया जाएगा? और सबसे जरूरी – क्या संरक्षित वन्यजीवों को वाकई सुरक्षा मिल पाएगी?

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