“जहाँ आम बिकते हैं, वहाँ दिल भी जीतते हैं”
पचमढ़ी लौटते समय बारिआम गांव में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का आत्मीय संवाद – आम खरीदे, बच्चों को बांटे, दिलों में जगह बनाई
नर्मदापुरम | 22 जून 2025 | विशेष प्रतिनिधि
राजनीतिक यात्रा में जब संवेदनशीलता और सहजता का रंग जुड़ जाए, तो वह केवल औपचारिक प्रवास नहीं रह जाता – वह एक जनमन को छूने वाला प्रसंग बन जाता है। कुछ ऐसा ही दृश्य रविवार को नर्मदापुरम जिले के बारिआम गांव में देखने को मिला, जब मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव पचमढ़ी प्रवास से लौटते समय सड़क किनारे आम बेच रही महिलाओं और उनके बच्चों के बीच सहजता से रुक गए।
यह दृश्य ना कोई मंच था, ना कैमरों का शोर – सिर्फ एक सरकारी काफिले की अचानक रुकती गाड़ियाँ और मुख्यमंत्री का सीधा संवाद, जो किसी फिल्मी दृश्य से कम नहीं था, लेकिन सच्चाई और आत्मीयता से भरपूर था।
???? “बहन, रोज कितने के आम बिकते हैं?”
मुख्यमंत्री ने महिलाओं से मुस्कुराते हुए पूछा।
श्रीमती बसंती टेकाम, जो टोकरी में आम सजा कर बैठी थीं, पहले तो संकोच में पड़ गईं। फिर जब उन्हें विश्वास हुआ कि मुख्यमंत्री ही उनसे बात कर रहे हैं, तो उन्होंने निश्छल भाव से बताया –
“सर, रोज 400-500 रुपए के आम बिक जाते हैं, सुबह से बैठते हैं।”
मुख्यमंत्री ने उनसे आगे पूछा – “ये बिटिया स्कूल जाती है?”
बसंती ने गर्व से बताया कि उनकी बेटी सीएम राइज स्कूल में पढ़ती है।
मुख्यमंत्री ने खुशी जताते हुए कहा –
“अब उसका नाम सांदीपनि विद्यालय हो गया है।”
यह संवाद ना केवल एक सरकारी घोषणा का मानवीय रूप था, बल्कि यह दिखाता है कि मुख्यमंत्री राज्य की योजनाओं को जमीनी स्तर पर जाकर स्वयं परखते और संप्रेषित करते हैं।
???? आम खरीदे, बच्चों में बाँटे – दिल जीतने वाला दृश्य
मुख्यमंत्री डॉ. यादव और उनकी धर्मपत्नी श्रीमती सीमा यादव ने वहां से कुछ आम खरीदे – और भुगतान भी किया। लेकिन उन्होंने आम अपने लिए नहीं रखे।
बल्कि वहीं मौजूद बच्चों – उमेश, साक्षी, रिया और अन्य बालकों को वह आम स्नेहपूर्वक बांट दिए।
मुख्यमंत्री ने बच्चों से नाम पूछे, उनसे पूछा –
“स्कूल जाते हो? क्या पढ़ते हो?”
बच्चों ने हाथ जोड़कर जवाब दिया – “जी सर।”
मुख्यमंत्री ने उन्हें रोज स्कूल जाने और मन लगाकर पढ़ाई करने की प्रेरणा दी।
???? यह एक छोटा ठहराव नहीं था, यह था जनसेवा का जीवंत उदाहरण
मुख्यमंत्री का यह सहज संवाद, केवल एक आम खरीदी की घटना नहीं थी। यह एक संकेत था – उस शासन का, जो जनता की नब्ज और जमीनी सच्चाई को समझता है।
गांव की महिलाएं, जिनकी मेहनत आम के हर टुकड़े में छलकती है, उन्हें राज्य के मुखिया का ऐसा स्नेह और संवाद मिलना, एक बड़ी सामाजिक स्वीकृति जैसा है।
????️ “नेता वो नहीं जो मंच से बोले, नेता वो जो आमजन के बीच आम जैसा हो जाए”
डॉ. मोहन यादव का यह भावुक और प्रेरक क्षण साबित करता है कि राजधर्म का सर्वोच्च रूप वह होता है, जहाँ प्रशासन संवेदना से भरा हो।








