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मनरेगा में ये कैसी मनमानी? हैरान जनता, लेबर परेशान — 5 रुपए से लेकर 13 रुपए प्रतिदिन तक का भुगतान!

 मनरेगा में ये कैसी मनमानी? हैरान जनता, लेबर परेशान — 5 रुपए से लेकर 13 रुपए प्रतिदिन तक का भुगतान!

✍️सीधी/कुशमी 

सीधी ज़िले के कुसमी जनपद पंचायत अंतर्गत मनरेगा मजदूरी भुगतान में गड़बड़ियों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। मजदूरों को 261 रुपए प्रतिदिन की निर्धारित दर के बदले कहीं 5 रुपए तो कहीं 13 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से भुगतान किया गया है। ये खुलासा तब हुआ जब समाजसेवी आनंद सिंह ददुआ ने पूरे मामले को उजागर करते हुए इसे मजदूरों के साथ धोखा करार दिया।

???? मास्टर रोल में दर्ज चौंकाने वाली मजदूरी

कुसमी जनपद की ग्राम पंचायत दरबार में जितेंद्र कुशवाहा की भूमि पर बने खेत तालाब कार्य में मास्टर रोल क्रमांक 16552 में मजदूरी ₹563 पैसे प्रतिदिन दर्शाई गई है। वहीं ग्राम पंचायत शंकरपुर में वन अधिकार के तहत बनाए गए खेत तालाब में मास्टर रोल क्रमांक 2044 पर मजदूरी ₹13.81 प्रतिदिन दर्ज है।

यह हाल सिर्फ दो ग्राम पंचायतों का नहीं, बल्कि कुसमी क्षेत्र की कई पंचायतों में मजदूरों की मेहनत के साथ इसी तरह का खिलवाड़ किया गया है।

????️ “जांच करवा देंगे” – जनपद सीईओ

जब इस गंभीर गड़बड़ी को लेकर जनपद सीईओ ज्ञानेंद्र मिश्रा से प्रतिक्रिया ली गई तो उन्होंने इस पर “अनभिज्ञता” जताई और रटे-रटाए अंदाज़ में “जांच कराएंगे” का जवाब देकर पल्ला झाड़ लिया।

गौरतलब है कि कुसमी जनपद में पहले भी ऐसे मामले उजागर हो चुके हैं। कुछ में कागज़ी कार्यवाही हुई, लेकिन सुधार की कोई स्थायी पहल अब तक नहीं की गई।

???? मजदूरों की मेहनत का मज़ाक

261 रुपए प्रतिदिन की दर पर मजदूरी देने का प्रावधान है, लेकिन पोर्टल पर दर्ज आंकड़े खुद इस लूट की पोल खोलते हैं। मजदूरों को 5 से 13 रुपए प्रतिदिन देना न सिर्फ मनरेगा की आत्मा के साथ धोखा है, बल्कि गरीबों के पेट पर लात मारने जैसा अमानवीय व्यवहार है। यहां तक की लम्बे समय से मजदूरी करने के बाद गरीब मजदूर अपनी मेहनत की कमाई के लिए इंतजार कर रहे हैं,कभी सरपंच तो कभी सचिव के चक्कर लगा रहे हैं जबकि जिम्मेदार सरकारी कुर्सी गर्म कर रहे हैं।

16 जुलाई को चक्का-जाम आंदोलन की चेतावनी

सामाजिक कार्यकर्ता आनंद सिंह ददुआ ने प्रशासन को चेताया है कि अगर जल्द जांच कर दोषियों पर कड़ी कार्रवाई नहीं की गई, तो वे 16 जुलाई को चक्का-जाम आंदोलन करेंगे। उनका कहना है कि यह सिर्फ मजदूरी का मामला नहीं, यह आम जनता के साथ योजनाबद्ध ठगी है, जिसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों-कर्मचारियों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।

गौर करने वाली बात यह है कि गरीबों के उत्थान के लिए चलाई गई मनरेगा जैसी योजनाएं अगर भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाएं तो गरीबों के लिए उम्मीद की आखिरी किरण भी बुझ जाती है। ज़रूरत है कि प्रशासन ऐसे मामलों में “जांच के झुनझुने” की जगह “दंड की सख्ती” दिखाए।

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