सिंगरौली के बंधा कोल ब्लॉक में ज़मीन का नहीं—हक़ का अधिग्रहण, पुलिस की ‘वर्दी वाली हेकड़ी’ चरम पर!
???? गरीब आदिवासियों के हिस्से आई लाठियां, पूंजीपतियों के लिए बिछा कालीन!
सिंगरौली ब्यूरो | sidhi24 news
सिंगरौली के बंधा कोल ब्लॉक में इन दिनों गर्मी केवल मौसम में ही नहीं, बल्कि ज़मीन के नीचे कोयले और ऊपर जनता के अंदर उबलते गुस्से में भी देखी जा रही है। मुद्दा है – ज़मीन का अधिग्रहण, लेकिन अंदाज़ ऐसा कि जैसे किसी हड़बड़ी में सौदा तय हुआ हो और गरीबों की सहमति “ड्राफ्ट” में रह गई हो।
???? ग्रामीणों का कहना है – “हमसे पूछा तक नहीं गया, बस जेसीबी आई, बुलडोज़र चला और वर्दीधारी फरमान सुनाने लगे!”
और प्रशासन का जवाब – “सब कुछ नियमों के मुताबिक है…”
(यह नियम शायद केवल “नीचे वालों” पर लागू होते हैं, ऊपर वालों के लिए तो ‘रियायतें’ हैं)

मंगलवार को देवसर SDM अखिलेश कुमार सिंह के नेतृत्व में पूरी फौज उतार दी गई, मानो गांव में कोई युद्ध होने जा रहा हो! थाना और चौकी प्रभारियों के साथ पुलिस ने मोर्चा संभाल लिया और “कोटा केबिन” टांग दिए—भूख, विरोध और जीवन का दर्द किसी मायने का नहीं! आदिवासी चीखते रहे—“यह हमारी ज़मीन है, हमारे पेड़ हैं, यही जीवन है…” लेकिन अफसरों के कानों में शायद कोल ब्लॉक की खनखनाहट गूंज रही थी।
????♂️ वर्दी वालों का जोश ऐसा कि मानो किसी गैंगस्टर पर रेड हो रही हो।
वहीं कुछ दिन पहले एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें रीवा पुलिस दयनीय स्थिति में “दादा-दादा” कहते हुए एक नेता के सामने हाथ जोड़ती नज़र आई थी—क्या ज़मीन पर हक मांगना नेता बनने से भी बड़ा जुर्म हो गया है?

???? इन जमीनों में आम, महुआ, तेंदू के पेड़ तो हैं, लेकिन प्रशासन की आंखों में केवल “ब्लॉक रेट” घूम रही है। आदिवासियों की आजीविका जाए भाड़ में!
???? वर्षों से जो लोग इन जमीनों पर काबिज हैं, वे अब “अवैध” हो गए हैं; और जो बड़ी गाड़ियों में आते हैं, वे “प्राधिकृत” हो जाते हैं।
वाह री व्यवस्था!
गरीब की जमीन सरकारी, और पूंजीपति का ठेका निजी!
???? सूत्र बताते हैं कि मुआवजे का खेल भी काफी ‘रसदार’ है। कुछ ‘वर्दीधारी’ और ‘फाइलधारी’ अधिकारियों के रिश्तेदारों के नाम ज़मीनें खरीद कर मोटा मुआवज़ा लिया गया। जांच की तो ऐसी फेहरिस्त निकलेगी कि अफसरशाही की पूरी वंशावली सामने आ जाएगी।
❗ सवाल यह है कि क्या सरकार की “सबका साथ-सबका विकास” की नीति केवल चुनावी मंचों की शोभा बनकर रह गई है?
या फिर वाकई में आदिवासियों, किसानों और आम नागरिकों के हिस्से में केवल लाठी और बुलडोज़र ही आने वाले हैं?








