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सोन नदी फिर बनी जलसमाधि की साक्षी: दो भाइयों की मौत, भंवरसेन घाट ने फिर निगली ज़िंदगियाँ

सोन नदी फिर बनी जलसमाधि की साक्षी: दो भाइयों की मौत, भंवरसेन घाट ने फिर निगली ज़िंदगियाँ

सीधी | रामपुर नैकिन
सोन नदी के भंवरसेन घाट पर सोमवार की दोपहर फिर वही मंजर देखने को मिला, जिसकी दस्तक पहले भी कई बार इस घाट ने दी थी — लेकिन हर बार की तरह इस बार भी किसी ने कुछ नहीं सीखा, न लोगों ने, न प्रशासन ने।

कुशमहर गांव के तीन युवक—अमित पांडेय, विजय अग्निहोत्री और दीपक द्विवेदी—सोमवार को नहाने निकले थे। लौटे तीनों में से सिर्फ एक। बाकी दो नदी की गहराई में खो गए, हमेशा के लिए।

जब नदी ने दो बेटों को लील लिया…

दीपक की आँखों में सिर्फ पानी नहीं था, उसमें अपने भाइयों को डूबते देखने की वो बेबसी थी, जो शब्दों में नहीं कह सकते। “मैं सिर्फ देखता रहा… कुछ नहीं कर सका… मैं तैरना नहीं जानता था,” वह बार-बार यही कहता रहा।तीनों को तैरना

नहीं आता था। फिर भी वो भंवरसेन घाट की उसी जानलेवा गहराई में उतरे, जहाँ पहले भी कई ज़िंदगियाँ दम तोड़ चुकी हैं।

ये पहली बार नहीं था, लेकिन शायद आख़िरी भी नहीं…

भंवरसेन घाट का इतिहास गवाह है कि यह घाट पहले भी कई परिवारों की खुशियों को निगल चुका है। कभी नहाते वक्त, कभी फोटो खिंचवाते हुए, तो कभी उत्सव के नाम पर बेपरवाही में डूबकर कई लोगों ने जान गंवाई है।

लेकिन ना कोई चेतावनी बोर्ड लगा, ना बैरिकेडिंग की गई, ना गोताखोरों की स्थायी टीम तैनात हुई। प्रशासन हर बार रटी-रटाई प्रतिक्रिया देता है—“जांच की जाएगी…”
और फिर अगली मौत तक सबकुछ वैसा ही रहता है।

प्रशासन की चुप्पी भी उतनी ही गहरी है, जितनी नदी की गहराई

घटना के बाद रामपुर नैकिन थाना प्रभारी सुधांशु तिवारी, चौकी प्रभारी नीरज साकेत और स्थानीय गोताखोर पहुंचे।
लेकिन सवाल यह है कि हर बार मौत के बाद क्यों पहुंचता है प्रशासन?
क्यों नहीं कोई स्थायी रोकथाम की पहल की जाती?

क्या सोन नदी की हर लहर अब किसी माँ की चीत्कार उठाएगी?

दो बेटों के मौत की खबर जब पहुंची तो गांव की गलियाँ चुप थीं, और माँओं की आंखें सवाल बनकर उठीं —
“कल किसकी बारी है?”

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