रिश्वत के बिना नहीं मिलता EWS प्रमाण पत्र? ठेंगरही के युवक ने तहसील बाबू पर लगाए गंभीर आरोप
सीधी | 22 जून 2025 | विशेष संवाददाता
सीधी जिले की गोपदबनास तहसील के ठेंगरही गांव से एक बार फिर भ्रष्टाचार की दुर्गंध उठी है।
ग्रामवासी सुनील गुप्ता ने शुक्रवार को तहसील कार्यालय में पदस्थ बाबू श्यामलाल केवट पर ₹2000 की रिश्वत मांगने और मना करने पर ईडब्ल्यूएस प्रमाण पत्र नकारने का आरोप लगाया है।
???? “रिश्वत नहीं दी तो अपात्र बना दिया”
सुनील गुप्ता ने कलेक्टर कार्यालय में शिकायती आवेदन सौंपते हुए बताया कि वे अपने EWS प्रमाण पत्र के नवीनीकरण के लिए तहसील कार्यालय पहुंचे थे।
बाबू श्यामलाल केवट ने पहले उनसे ₹2000 की मांग की और जब सुनील ने रिश्वत देने से इंकार किया, तो बिना किसी दस्तावेज़ीय आधार के उन्हें ‘अपात्र’ घोषित कर दिया गया।
“मेरे पास पहले से वैध EWS प्रमाण पत्र है। यदि मैं अपात्र होता, तो वो भी रद्द हो जाता। यह सीधा भ्रष्टाचार है,” — सुनील गुप्ता
????️♂️ पहले भी हो चुकी हैं शिकायतें, पर कार्रवाई शून्य
स्थानीय सूत्रों के मुताबिक, बाबू श्यामलाल केवट के खिलाफ पहले भी रिश्वत व मनमानी के कई आरोप लग चुके हैं।
जनसेवा की जगह जेब सेवा की यह कार्यप्रणाली आमजन के बीच आक्रोश और असहायता का कारण बन चुकी है।
परंतु अब तक किसी भी स्तर पर कोई ठोस अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की गई है।
???? EWS प्रमाण पत्र क्यों है महत्वपूर्ण?
EWS (आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग) प्रमाण पत्र नौकरियों, शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी योजनाओं में आरक्षण का आधार बनता है।
इसके वितरण में रिश्वत की मांग संविधानिक प्रावधानों और पारदर्शिता की हत्या के समान है।
????️ प्रशासन का रुख
एसडीएम गोपदबनास, नीलेश शर्मा ने कहा कि उन्हें अभी तक आवेदन की प्रतिलिपि प्राप्त नहीं हुई है।
“जांच कराई जाएगी। अगर आवेदक पात्र है, तो प्रमाण पत्र जरूर जारी किया जाएगा। रिश्वत के आरोप बेहद गंभीर हैं, इस पर कार्यवाही की जाएगी।”
❗ क्या प्रशासन इस बार उठाएगा कदम?
बार-बार शिकायतें और शिकायतकर्ताओं की अनदेखी, प्रशासन की निष्क्रियता पर भी सवाल खड़े कर रही है।
क्या अब सुनील की आवाज़ बाबूगिरी के इस भ्रष्ट तंत्र में बदलाव ला पाएगी? या फिर ये मामला भी फाइलों और खानापूर्ति की चक्की में पिस जाएगा?
???? जनहित में सवाल:
- क्या रिश्वत देने से ही अब सामान्य वर्ग को उनका अधिकार मिलेगा?
- तहसील जैसे आधारभूत कार्यालयों में पारदर्शिता की गारंटी कौन देगा?
- क्या शासन द्वारा संचालित जनसुनवाई तंत्र इन शिकायतों को वास्तव में गंभीरता से ले रहा है?








