सीधी जिला अस्पताल की लापरवाही से महिला और नवजात की जान पर बनी, परिजन हुए परेशान
सीधी। मझिगवा गांव निवासी एक गर्भवती महिला सरोज गुप्ता को अचानक तेज प्रसव पीड़ा शुरू हुई, जिसके बाद परिजन उन्हें आनन-फानन में मड़वास अस्पताल ले गए। वहां पहुंचने पर चिकित्सकों ने देखा कि नवजात का आधा हिस्सा गर्भ से बाहर था और आधा अंदर फंसा हुआ था। स्थिति गंभीर देखते हुए महिला को तत्काल जिला अस्पताल सीधी रेफर कर दिया गया।
जिला अस्पताल में नहीं मिला इलाज, निजी अस्पताल भेजने का आरोप
पीड़िता के पति रजनीश गुप्ता का आरोप है कि जिला अस्पताल पहुंचने पर उन्हें उम्मीद थी कि तत्काल इलाज मिलेगा, लेकिन वहां मौजूद स्टाफ ने महिला की हालत को न तो सही से देखा और न ही किसी प्रकार का उपचार शुरू किया। इसके बजाय उन्होंने कहा कि यदि वे निजी अस्पताल नहीं जाते तो मां और बच्चे की जान को खतरा हो सकता है। इसके बाद परिजन महिला को मजबूरी में ‘श्री नर्सिंग होम’ ले गए।
निजी अस्पताल में खर्च हुए 70 हजार रुपए
प्राइवेट अस्पताल में महिला की डिलीवरी हुई, लेकिन परिजनों को इस प्रक्रिया में लगभग 70 हजार रुपए का खर्च उठाना पड़ा। सरकारी अस्पताल की लापरवाही और संवेदनहीनता से नाराज़ परिजनों ने इस पूरे मामले की शिकायत मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) सीधी से की है।
सीएमएचओ का बयान – “शिकायत मिली तो होगी जांच”
इस मामले में सीएमएचओ डॉ. बबीता खरे का कहना है, “मुझे अभी इस घटना की जानकारी नहीं है। गंभीर स्थिति में हम मरीजों को संजय गांधी अस्पताल रीवा रेफर करते हैं। कई लोग स्वयं ही निजी अस्पताल चले जाते हैं। अगर ड्यूटी पर मौजूद स्टाफ ने जानबूझकर निजी अस्पताल भेजने की सलाह दी है तो यह गंभीर मामला है, और शिकायत मिलने पर जांच कर कार्रवाई की जाएगी।”
समाज में गूंज रहा सवाल
इस घटना ने एक बार फिर सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था और जवाबदेही पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जब जिला अस्पताल जैसी संस्थाएं ही गंभीर मामलों में मरीजों को प्राथमिक उपचार तक देने से पीछे हटती हैं, तो ग्रामीण जनता का भरोसा सरकारी स्वास्थ्य तंत्र पर कैसे कायम रह पाएगा?








