सीधी को मिले दो नए शव वाहन, सांसद ने दिखाई हरी झंडी – लेकिन उठे सवाल: क्या आमजन को वाकई मिलेगा लाभ?
सीधी, 3 अगस्त 2025।
जिले को दो नए शव वाहन मिलने के साथ ही स्वास्थ्य सेवा के एक महत्वपूर्ण पहलू को मजबूती देने की कोशिश की गई है। रविवार को जिला अस्पताल परिसर से सांसद डॉ. राजेश मिश्रा ने दोनों वाहनों को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। यह सुविधा राज्य शासन के लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग द्वारा उपलब्ध कराई गई है, जिसका उद्देश्य शासकीय अस्पतालों में मृत्यु के उपरांत मृतकों के पार्थिव शरीर को निःशुल्क उनके घर या श्मशान घाट तक पहुंचाना है।
सांसद डॉ. मिश्रा ने इसे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की “संवेदनशील पहल” बताया और उम्मीद जताई कि इससे खासकर गरीब परिवारों को राहत मिलेगी, जिन्हें अब शव वाहन के लिए निजी साधनों या अवैध वसूली का सामना नहीं करना पड़ेगा।
कागज़ों पर वाहनों की उपलब्धता, ज़मीन पर अनिश्चितता?
हालांकि इस पहल की सराहना हो रही है, लेकिन सवाल भी उठने लगे हैं कि क्या ये वाहन वास्तव में जरूरतमंदों को समय पर उपलब्ध कराए जाएंगे?
स्वास्थ्य विभाग की ज़मीनी हकीकत जानने वाले लोग यह कहते नहीं थकते कि अक्सर शव वाहन “ड्राइवर नहीं है”, “डीजल नहीं है”, “गाड़ी खराब है” जैसे बहानों के चलते जरूरतमंदों को निजी साधनों का सहारा लेना पड़ता है। ऐसे में नए वाहनों की स्थिति भी पहले जैसे न हो, इसकी चिंता बनी हुई है।
पुराने शव वाहनों का क्या हुआ?
यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि जिले में पहले से उपलब्ध शव वाहनों की क्या स्थिति है। कुछ वाहन वर्षों से जर्जर हालत में पड़े हैं या दिखावे भर के लिए उपयोग में लाए जा रहे हैं। उनका मेंटेनेंस, रजिस्ट्रेशन व स्टाफ की नियुक्ति जैसे मुद्दे अब तक अधूरे हैं।
स्वास्थ्य विभाग को देनी होगी ज़िम्मेदारी की परीक्षा
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. बबिता खरे ने बताया कि शव वाहन केवल शासकीय अस्पतालों में मृत्यु के प्रकरणों में निःशुल्क उपलब्ध कराए जाएंगे और इनका संचालन जिले की सीमाओं तक ही सीमित रहेगा। लेकिन ग्रामीणों का तर्क है कि नियमों की आड़ में कई बार वाहन देने से इनकार कर दिया जाता है। ऐसे में यह ज़रूरी है कि स्वास्थ्य विभाग न केवल नीति बनाए, बल्कि यह भी सुनिश्चित करे कि आमजन तक उसका लाभ बिना बाधा पहुंचे।
जनता की नजरें अब अमल पर
शव वाहन मिलने की घोषणा और हरी झंडी दिखाने की रस्म तो पूरी हो गई, अब असली चुनौती होगी उनके निष्पक्ष और संवेदनशील संचालन की। यदि स्वास्थ्य विभाग इसे गंभीरता से ले और पारदर्शी व्यवस्था बनाए, तभी यह सेवा वास्तव में जनहित में साबित होगी—वरना यह भी एक और “सरकारी घोषणा” बनकर रह जाएगी।








